<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792</id><updated>2011-07-30T21:54:54.278-07:00</updated><category term='ब्लाग'/><category term='आलाप'/><category term='खेल संस्कृति'/><category term='अंर्तनाद'/><category term='अरविंद चतुर्वेदी'/><category term='अंतर्नाद'/><category term='कानों देखी'/><category term='अन्तर्नाद'/><category term='कामनवेल्थ गेम्स'/><category term='मच्छर मनोदशा'/><category term='यथा नामे तथा गुणे'/><category term='चौपाल'/><category term='राष्ट्रमंडल खेल'/><category term='हास-परिहास'/><category term='खेलकूद'/><category term='अन्तर्मन'/><title type='text'>तरकश</title><subtitle type='html'>विचारों का...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>18</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-1284733481286882029</id><published>2010-10-23T01:02:00.000-07:00</published><updated>2010-10-23T01:06:11.972-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अरविंद चतुर्वेदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खेलकूद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कामनवेल्थ गेम्स'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रमंडल खेल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खेल संस्कृति'/><title type='text'>पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब…</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/TMKW9j73MHI/AAAAAAAAAGc/7vOITK2hWyo/s1600/commonwealth-games-20103.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 240px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/TMKW9j73MHI/AAAAAAAAAGc/7vOITK2hWyo/s400/commonwealth-games-20103.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5531149276726898802" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;… और घड़ी की सूइयों ने तीन अक्टूबर के  दिन शाम के सात बजा दिए। इसी के साथ १९वें राष्ट्रमंडल खेलों के उद्घाटन समारोह की औपचारिक शुरुआत हो गई। अब तक इन खेलों के बारे में अच्छा और केवल अच्छा बोलने, लिखने और पढ़ने की आदत भी बन चुकी थी। सच भी है, अंत भला तो सब भला। लेकिन अभी इसका समापन ११ दिन दूर है। हालांकि देश का एक सच्चा नागरिक होने के नाते हम सबको इसके सफल समापन की कामना करनी चाहिए। दुनिया में अपनी युवाशक्ति के बूते असाध्य को साध्य में तब्दील करने की माद्दा रखने वाले देश की इस खेल आयोजन ने खूब जगहसाई कराई। किरकरी करने का आलम यह था कि जो देश किसी भी क्षेत्र में हमारा पासंग भी नहीं है वे लोग भी कीचड़ उछालने में सबसे आगे रहे। ताज्जुब तो तब हुआ जब ऐन वक्त पर भी देसी मीडिया उत्साहवर्धक खबरें छापने के बजाय सांप मिलने की सफोटो हतोत्साहित खबरें प्रकाशित करने लगा। (हालांकि इस मामले में मेरे विचार गलत हो सकते हैं और इसमें व्यापक बहस की पूरी-पूरी गुंजायश है)। कई जगह तो नियिमत कालम तक शुरू हो चुके थे। विदेशी यहां आकर फेक स्टिंग आपरेशन कर हमारी ही धज्जियां उधेड़ने में लग चुके थे। लेकिन अब जब सफल शुरुआत हो चुकी है तो देश के अब तक के सबसे बड़े इस खेल आयोजन को सफलता के अंतिम मुकाम तक पहुंचाने की दिशा में प्रयास हर भारतवासी का प्रथम कर्तव्य बन जाता है। हम इतनी जगहसाई के पात्र बने, क्यों बने????????? कभी किसी ने सोचने समझने की शायद ही जहमत उठाई हो। प्रथमदृष्टया तो यही लगता है कि जब अपने माल में ही खोट है तो गैरों को क्या दोष दें, लेकिन बात यही खत्म नहीं होती मेरे दोस्त।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल इन राष्ट्रमंडल खेलों में अकूत धन झोंकने के बाद भी इस अंजाम के लिए किसी को दोषी मानना उचित नहीं लगता है। खेल की तैयारियों में साजिशन देरी करने और भ्रष्टाचार जैसे मामलों में संलिप्त रहे लोगों को सजा निश्चित तौर पर मिले, इसमें किसी को गिला-शिकवा नहीं होना चाहिए, लेकिन इन तब अल्पकालिक निदानों के साथ इस समस्या की जड़ का गहराई से अवलोकन किया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल हमारे यहां खेल संस्कृति का ही परम अभाव है। जो अधिकारी इन खेलों की देखरेख कर रहे हैं उनके खून में ही नहीं है खेल। वे भी हम लोगों की तरह बचपन में खेलने के लिए मार खाए होंगे। इसीलिए तो राष्ट्रमंडल  खेलों को इतनी सीरियसली नहीं लिया जा रहा है। कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक सबकी यही सोच हो गई है कि अरे यार हो जाएगा न। इस सोच के पीछे अनेकानेक कारण हैं जिनका खामियाजा आज देश की साख के साथ चुकाना पड़ रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक अनुमान के मुताबिक हमारे देश में कुल दो फीसदी स्कूलों में ही प्ले ग्राउंड हैं। जो प्ले ग्राउंड हैं भी उनके बारे में यह खुशफहमी निकाल दीजिए कि पश्चिमी देशों की तरह इन खेल के मैदानों में खेल की सारी सुविधाएं मौजूद होगी। यहां तो स्कूल के आगे,पीछे या अगल, बगल छोटा सा खुला मैदान का टुकड़ा होता है जहां बच्चे केवल खुला खेल फर्रुखाबादी यानी केवल दौड़ लगा सकते हैं। उनको क्या पता कि फलां खेल में क्या क्या सुविधाएं होनी चाहिए। बहरहाल कुछ बच्चे तो शौकिया तौर पर खेलकूद में रुचि लेते हैं। स्कूल के बाद गांव या मुहल्ले के बच्चों के साथ खेल के शौक को पूरा करते हैं। लेकिन शौक चुपके-चुपके और भयावह डर के बीच पूरा होता है। अगर घर वालों को पता चल गया कि फलाने खेलने गए थे तो समझो खैर नहीं। इस परंपरागत मानसिकता के तहत हमारे यहां खेलने में समय को जाया करना समझा जाता है। नीति वचनानि के तहत खेलकर लौटते ही आपको मार के साथ पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे होगे खराब जैसा जुमला मुफ्त में सुनाया जाएगा। यह खेल को (खेल-कूद) फन या एंज्वाय करना माना जाता है। जब परंपरागत रूप से कभी हमने खेल को सीरियसली लिया ही नहीं तो हमारे ये अधिकारी भला इस मानसिकता का परित्याग कैसे करते। आखिर इनके पूर्वज भी तो इसी मानसिकता के ओत-प्रोत रहे हैं और क्या-पता कभी इनको भी बख्शीश में लात-घूंसे समय बर्बादी के चलते खाने पड़े हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास गवाह है दूसरे देश के नेताओं से अलग हमारे नेताओं ने कभी खेल में बहुत रुचि नहीं दिखाई। इसका ताजा सबूत है कि राष्ट्रमंडल खेलों की शुरुआत दो अक्टूबर के बाद हो रही है। जिस महापुरुष के जन्मतिथि के बाद इन खेलों की शुरुआत हो रही है, खेलों के प्रति उसकी विरक्ति जगजाहिर है। महापुरुष हैं इसीलिए तो यह सत्य भी इन्होंने अपनी आत्मकथा में स्वीकार कर लिया है। १९३२ में दुनिया में परचम लहराती भारतीय हाकी का लास एंजेल्सि खेलों में भागीदारी करने के लिए वित्तीय मदद के सवाल पर इन राष्ट्रपुरुष ने जवाब में सवाल दागकर कहा कि हाकी क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ये महापुरुष थे और एक वो महापुरुष था माओ। १९१७ में माओ ने जो पहला पत्र लिखा था उसका मजमून खेल की महत्ता पर आधारित था। चीन की तरह खेल हमारे देश में कभी केंद्रीय नीति का हिस्सा नहीं रहे। हालांकि देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने खेल के लिए थोड़ा बहुत किया भी। कम से कम पार्टी की नीतियों के खिलाफ जाकर राष्ट्रमंडल में देश को शामिल तो कराया। आज भले ही सभी खेल संघ नेताओं के चंगुल में लंबे समय से चले आ रहे हों लेकिन बीजिंग ओलंपिक में महज एक स्वर्ण की उपलब्धि एक अरब से ज्यादा की आबादी के लिए किसी तमाचे से कम नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेल जगत में अगर हमें देश को कोई मुकाम दिलाना है तो स्वामी विवेकानंद के पदचिह्नों पर चलना होगा। स्वामी विवेकानंद ने एक बार देशवासियों को भगवान प्राप्ति का एक सहज मार्ग सुझाया था। उन्होंने कहा था कि कोई भी व्यक्ति बहुत आसानी से भगवान को प्राप्त कर सकता है यदि वह घंटो किसी धार्मिक ग्रंथ को पढ़ने की बजाय फुटबाल खेले। आज जरूरत खेल संस्कृति विकसित करने की है न कि खिलाड़ी तैयार करने की या बड़े खेल आयोजन करवाकर मलाई काटने की।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-1284733481286882029?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/1284733481286882029/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=1284733481286882029' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/1284733481286882029'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/1284733481286882029'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2010/10/blog-post_23.html' title='पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब…'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/TMKW9j73MHI/AAAAAAAAAGc/7vOITK2hWyo/s72-c/commonwealth-games-20103.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-7814920639838441348</id><published>2010-10-23T00:53:00.000-07:00</published><updated>2010-10-23T01:00:19.835-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अरविंद चतुर्वेदी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लाग'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मच्छर मनोदशा'/><title type='text'>एक मच्छर की मनोदशा</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/TMKVtWFGKfI/AAAAAAAAAGU/4W5ozWvrEv4/s1600/mosquito.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 340px; height: 283px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/TMKVtWFGKfI/AAAAAAAAAGU/4W5ozWvrEv4/s400/mosquito.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5531147898617997810" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;राजधानी दिल्ली सहित पूरे देश में मच्छरराज व्याप्त&lt;br /&gt; है। कुछ तो इनके प्रकोप और कुछ इनके आतंक की&lt;br /&gt;परीकथाओं से बच्चे-बच्चे की जुबान पर इन मच्छरों &lt;br /&gt;का नाम चढ़ चुका है। डेंगू, चिकनगुनिया सहित कई&lt;br /&gt;अज्ञात बीमारियों को बढ़ावा देने वाले मच्छरों को बैठे- &lt;br /&gt;बिठाए आजकल सेलेब्रिटी का तमगा मिल चुका है। इस&lt;br /&gt;पदवी के लिए न तो इन्हें किसी रियलिटी शो का हिस्सा &lt;br /&gt;बनना पड़ा और न ही लाइमलाइट में आने के लिए &lt;br /&gt;कोई ऊंटपटांग हरकत ही करनी पड़ी। नतीजतन आज कई &lt;br /&gt;नामी गिरामी शख्सियतें इनके रसूख से रश्क करने लगी &lt;br /&gt;हैं। नाना प्रकार की मीडिया के चलते चहुंओर इनका गुणगान&lt;br /&gt;सहज ही देखा जा सकता है। इनकी पब्लिसिटी का &lt;br /&gt;आलम यह है कि आजकल सबलोग अपने आसपास &lt;br /&gt;इनकी मौजूगदी को सुनिश्चित कर लेना चाहते हैं।&lt;br /&gt;अपने खड़े, बैठे या लेटे समय चाहे कोई वस्तु दिखे या&lt;br /&gt;न दिखे लेकिन मच्छरों के मौजूदगी की आश्वस्ति के &lt;br /&gt;उपरांत उपक्रम को अंजाम देना लोगों की दिनचर्या का &lt;br /&gt;अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। &lt;br /&gt;हे श्रेष्ठ मानव, लिहाजा मैने भी आसन ग्रहण करने के&lt;br /&gt;साथ ही अपने आसपास चौकन्नी निगाह डाली। मेरी &lt;br /&gt;तीक्ष्ण नजरों की जद में एक मच्छर आ ही गया। &lt;br /&gt;लहराते श्रृंगों और ललचाई नजरों से मेरी तरफ देख रहा &lt;br /&gt;था। हालांकि तबतक मैं अति सक्रियता की स्थिति में &lt;br /&gt;आ चुका था लिहाजा मेरे ऊपर आक्रमण का उसे मौका &lt;br /&gt;नहीं मिल सका। उसने घेरा और कसा किया लेकिन&lt;br /&gt;मेरी वक्र दृष्टि से उसे यह आभास हो चुका था कि यहां &lt;br /&gt;उसकी दाल नहीं गलने वाली। फलस्वरूप हमले की रणनीति &lt;br /&gt;के परिणामों की मन ही मन गणना करते हुए अपना &lt;br /&gt;अंतिम असफल प्रयास को अंजाम दिया। उसके डैनों&lt;br /&gt;से ज्यादा तेज गति से कुर्सी पर बैठे बैठे मेरे घूर्णन से &lt;br /&gt;वह मच्छर थोड़ा अचंभित हुआ और बिना सांस लिए&lt;br /&gt;एक साथ मेरी तीन चार परिक्रमा करने के बाद शून्य&lt;br /&gt;में ओझल हो गया। मैं जड़वत कुर्सी पर विराजमान रहा। &lt;br /&gt;अब तक मैं सोचने की मुद्रा में आ चुका था।&lt;br /&gt;शून्य में ताकते हुए हुए मैने सोचना शुरू किया। अगर&lt;br /&gt;यह आर्थोपोडा संघ का जीव आज मुझे डस लेता तो &lt;br /&gt;कई बातें होतीं। मैं किसी रोग से संक्रमित हो सकता था&lt;br /&gt;लेकिन मच्छर को क्या होता। मान लीजिए रक्तपान की&lt;br /&gt;दुस्साहसिक कोशिश के दौरान वह बेचारा शहीद भी हो&lt;br /&gt;सकता था। अच्छा चलो अगर खून चूसने के काम में&lt;br /&gt;कोई मच्छर सफल भी होता होगा तो क्या सोचता होगा? &lt;br /&gt;खून का स्वाद कैसा है? उसके स्वादानुसार रहा तो ठीक&lt;br /&gt;अगर किसी धन्य पुरुष के कसैले खून का पान किया तो &lt;br /&gt;बुरा सा मुंह बनाते हुए अमुक व्यक्ति को ब्लैक लिस्टेड&lt;br /&gt;कर देता होगा। हो सकता है मुंह का जायका खराब हो जाने पर&lt;br /&gt;अपनी संस्कृति की सीमा रेखा को लांघ भी सकता है। &lt;br /&gt;बेचारा मच्छर…….। उई………… मेरी तो चीख निकल गई। &lt;br /&gt;दरअसल एक सेलेब्रिटी मच्छर ने अभी अभी बेदर्दी से&lt;br /&gt;मेरा रक्तपान करके मेरी तंद्रा भंग कर दी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-7814920639838441348?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/7814920639838441348/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=7814920639838441348' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/7814920639838441348'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/7814920639838441348'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='एक मच्छर की मनोदशा'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/TMKVtWFGKfI/AAAAAAAAAGU/4W5ozWvrEv4/s72-c/mosquito.jpg' height='72' 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/&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/7143490105190842976/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=7143490105190842976' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/7143490105190842976'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/7143490105190842976'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='उदासी'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-6376754136161223154</id><published>2008-04-06T01:55:00.000-07:00</published><updated>2008-04-06T01:57:21.798-07:00</updated><title type='text'>आर्थिक बूम यही है का</title><content type='html'>सबसे पहले तो पिछले कुछ दिनों से गायब रहने के लिए माफी चाहूंगा । दरअसल जिंदगी की भाग दौड़ में &lt;br /&gt;मन कब किस चीज से विरक्त हो जाए और कब किस पर आसक्त हो जाए,समझना टेढ़ी खीर है । खैर जब अब आ ही गए है तो सबको नमस्कार ठोंकना चाहूंगा ।&lt;br /&gt;आज अखबार बांचते समय ध्यान गया एक खबर पर । दिल्ली ने जनसंख्या के हिसाब से मुंबई का रिकार्ड तोड़ दिया है । एक संस्था द्वारा किए गए अध्ययन में दिल्ली की आबादी २.२ करोड़ से ज्यादा है वहीं मुंबई की आबादी १.९४ करोड़ है ।&lt;br /&gt;इसमें कोई संदेह की गुंजाइश नहीं है कि मुंबई अब भी सबसे ज्यादा भीड़ भाड़ वाला शहर है । यहां जनसंख्या घनत्व अब भी दिल्ली से कई गुना ज्यादा है।&lt;br /&gt;खैर बात दिल्ली की हो रही थी। यहां की मुख्यमंत्री शीला दीछित पिछले नौ सालों से कुरसी पर विराजमान है । अपने बयानों से विवाद खड़े करना इनको शायद अच्छा लगता है। पिछले दिनों ब्लूलाइन से सडक दुर्घटनाओं पर बयान दिया कि इसके पीछे पैदल यात्री जिम्मेदार हैं । ये लोग संभलकर नहीं चलते । खूब हो हल्ला हुआ । बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश करने की दलीलें दी गयी। मामला आया गया हो गया ।&lt;br /&gt;अभी कल के अखबार में महंगाई पर इनका एक और बयान छपा है । बयान में इन्होंने कहा कि महंगाई इसिलए है क्योंकि इकोनामी बूम कर रही है । लोगों के पास पैसा आ रहा है लोग चीजें ज्यादा खरीद रहें है । इसलिए वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे है।&lt;br /&gt;अच्छा चलिए, मान लेते हैं कि लोगों के पास पैसा खूब आ रहा है तो कितना आलू टमाटर भिंडी गोभी खरीद कर डंप करोगे या दाल चावल तेल अनाज खाने की चीजें आदमी जरुरत भर का ही खरीदेगा । या साल भर का इकट्ठा भंडारण कर लेगा ।&lt;br /&gt;माननीय मुख्यमंत्री जी को यह बात समझना चाहिए ।&lt;br /&gt;दूसरी बात यह कि अगर मुद्रास्फीति बढ़ने और अर्थव्यवस्था के बूम में कोई सीधा संबंध होता तो जिंबाबे की अर्थव्यवस्था की विकास दर सब देशों से तेज होती । वहां मुद्रास्फीति १ लाख फीसदी से ज्यादा है । एक जून का भोजन करीब १.५ लाख डालर का पड़ रहा है । अब श्रीमती दीछित जी क्या बताएंगी कि जिंबाबे की विकास दर कितनी तेज है ।&lt;br /&gt; सोचिए सात फीसदी मुद्रास्फीति में हमारे यहां आलम ये है तो वहां क्या होगा । सब्जी खरीदने जाओ तो दुकानदार पाव में भाव बताता है । सब्जी वाला हमारी हैसियत से वाकिफ होता है । उसको पता है कि फलां मद में भाई साहब एक निश्चित रकम ही खरचेंगे । जमीनी हकीकत यह है और बयानबाजी ये हो रही है कि लोग खूब खरीद रहे है जिससे महंगाई बढ़ रही है ।&lt;br /&gt;एक किस्सा बताना चाहूंगा हमारे यहां गांव में कहावत है कि प्रायमरी के अध्यापक टमाटर कटवाकर खरीदते है । इसके पीछे की जो कहानी है वह इस प्रकार है ।&lt;br /&gt;एक मास्टर साहब बाजार गए सब्जी खरीदने । ताजे बड़े-बड़े टमाटर देख कर अपने आपको रोक न सके।&lt;br /&gt;कौतुक बस पूछ ही लिया दुकानदार से क्या रेट है भाई टमाटर,मास्टरजी मुहल्ले के सम्मानित व्यक्ति थे सो विनम्रता के साथ दुकानदार बोला माटसाब २० रु किलो । मास्टर साहब ने कहा बड़े महंगे लगा रखे हो यार । जबाब मिला क्या करें माटसाब मंडी से ही यही हाल है । ऊपर से किराया मार डाल रहा है ।&lt;br /&gt;खैर चूंकि माटसाब दाम पूंछ ही चुके थे तो इज्जत बचाने के लिए लेना ही पड़ता । इसलिए बोले कि अच्छा ठीक है १०० ग्राम दे दो । अब दुकानदार के सारे टमाटर बड़े बड़े । कोई सौ ग्राम का नहीं सब ऊपर । हारकर उसने  कहा माटसाब काट कर टमाटर नहीं बेंचता हूं ।&lt;br /&gt;आश्चर्य न करें तब प्रायमरी के अध्यापक की तनख्वाह आज की तरह नहीं थी । तब ५०० रुपये में मन लगाकर पढ़ाते थे और अपने परिवार का भरण पोषण करते थे । अब हालत ये है कि ज्यादा तनख्वाह में भी पढ़ाने में मन नहीं लगता ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-6376754136161223154?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/6376754136161223154/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=6376754136161223154' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/6376754136161223154'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/6376754136161223154'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2008/04/blog-post.html' title='आर्थिक बूम यही है का'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-2741422063839199974</id><published>2008-03-03T00:47:00.000-08:00</published><updated>2008-03-03T00:53:21.978-08:00</updated><title type='text'>अथ श्री सत्यनारायण प्रथमोध्याय समाप्तः</title><content type='html'>जीवन में क्या क्या करना पड़ जाए,कुछ कहा नहीं जा सकता है । ऐसा ही कुछ एक बार मुझे करना पड़ा । मैं बीएससी द्वितीय वर्ष का छात्र था ।  शनिवार की शाम को हम लोग घर चले जाया करते थे । संयोग से एक बार अगले दिन रविवार को पुन्ववासी (पूर्णमासी)पड़ रही थी । लग्न नछत्र एवं मुहुर्त का कुछ ऐसा घालमेल था कि उस दिन सत्यनारायण भगवान की कथा एवं पूजा कराने वालों की इफरात थी । पंडित ढूंढे नहीं मिल रहे थे । हमारे गांव में एक पंडित जी निर्वसिया (अकेले,शादी नहीं की थी) थे । खुद को तो कुछ आता जाता नहीं था लेकिन जजमानी (पुरोहिताई) पूरे इलाके में फैला रखी थी । ठेके पर पंडितों से काम करवाते थे । आज की भाषा में बोलें तो पुरोहिताई की आउटसोर्सिंग करते थे । हमारे इलाके में नए पंडितों की खेप तैयार करने का पूरा श्रेय उन्हीं को जाता है । एक चीज जो और खाश थी उनके बारे में वो था उनका नाम । पूरे इलाके में चिरकुट पंडित के नाम से सन्नाम थे ।तो भइया उस पुन्ववासी के दिन इनके पास भी पंडितों का अकाल पड़ गया । परेशान से हमारे मोहारे (दरवाजे)के पास से गुजर रहे थे । मैने प्रणाम किया तो आशीष के साथ पूछे कब आया हो ?बाबा कलहियां शमवा कय । अच्छा भय राजू पंडित नाय मिलत अहैं । कथा कहय का रहा। ससुर बड़ी लड़जरन बा । हमारे बाबाजी को संबोधित करते हुए,अरे भैयवा येही लड़कवा का भेज देत्या करौनी एक ठी कथा कहय का रहा । बाबा ने कहा अरे ऊ जाबय न करे । ऊ आज कय लवन्डा आय,कथा वथा थोड़य कहे । वही से पूछ ल्या जाय तौ लय जा । बाबाजी ने उनको मेरी इच्छा जानने के लिए कहा । बुजुर्गो के प्रति असीम श्रद्धा भाव हमारी कमजोरी बन गया । इनकार न कर सके लेकिन फिर भी आशंका व्यक्त की, अरे पंडित जी हम कब्भऊ (कभी नहीं) कथा नाय कहे हई । पंडित जी ने कहा बेटा इतना ऊंचे दरजा में पढ़त हया अऊर किताबें मा लिखा न पढ़ पउब्या । हमने उत्तर दिया ऐसी बात नहीं है पंडित जी किताब में जो लिखा होगा उसको तो पढ़ ही लूंगा लेकिन जो अन्य चीजें करनी होती है जैसे फूल रखने,अछत रखने और टीका लगाने,आरती के समय,गोदान,या हवन के समय जो श्लोक पढ़े जाते हैं वो सब मैं थोड़े ही जानता हूं । और वो सब किताब में भी नहीं लिखे रहते । पंडित जी ने भरोसा दिलाते हुए कहा बेटवा वोकर चिंता तू न करा । हम का करय चलत हई । ऊ सब हम करवाय देब । खैर हम नही धोकर धोती तो नहीं पहनी पैंट शर्ट पहनकर चल दिए । दरवाजे पर पहुंचे तो पंडित जी ने कहा कि सब तैयार हय क्या । जजमान ने हाथ जोड़कर कहा हां पंडित जी बस आप चलय बेदी पर । सब इंतजार कर रहें हय । पंडित जी मुझको लेकर बेदी पर पहुंचे और कहा आपको कथा नए पंडित जी सुनाएंगे । सबकी नजरें हमारी तरफ । चेहरे पर आश्चयॆ और उपेछा का भाव । मैं सहसा डर गया । पंडित जी भी भांप गए ,सबको बोले ऐसे मत देखो बहुत ऊंचे दरजे में पढ़ रहा है । खैर कथा शुरू हुई । तमाम कर्मकांड पहले करने पड़ते हैं मैने इशारे से पंडित जी को कहा लेकिन वो जैसे मेरी तरफ ध्यान ही नहीं दे रहे थे । बहुत दुख हुआ सोचा कि आज तो बड़ी बेइज्जती हो जाएगी मार ऊपर से पड़ेगी । फिर मैंने कछा ६ से लेकर ८ तक संस्कृत परिचायिका के जितने श्लोक कंठस्थ किए थे बारी बारी से सबको अजमाया और सबका प्रयोग किया । गनीमत यही रही कि जहां कथा हो रही थी वह परिवार कम पढ़ा लिखा था और श्रद्धालु जो आए थे सुनने वो भी शायद संस्कृत में टाइट थे वरना पंडित जी के साथ हमारी भी कुटाई हो जाती । एक बार तो नाईन ने टोक भी दिया था । हुआ ये कि जब मैं श्लोक पढ़ता तो कोई लंबा श्लोक बिना पूरा किए नहीं रूकता था । बगल में बैठे पंडित जी मुझे हुरिया (कोहनी मार) देते थे । आशय यह होता था कि अब बस करो । नाईन जिसे आधा पंडित माना जाता है उसने पंडित को टोका,पंडित जी आप छोटकऊ पंडी जी को पूरी मंतर पढ़ने से मना क्यों करते हों ।खैर सब अच्छा हुआ । लेकिन यह अनुभव हमेशा एक नया रोमांच देता है ।हां कथा के दौरान मंत्र के रुप में मैने एक श्लोक यह भी पढ़ा था जो शायद संस्कृत परिचायिका कछा ६ की किताब से उद्धृत था ।&lt;br /&gt;चलंतु वीर सैनिकः,पर्यान्तु वीर सैनिकःसगौरवं साडिम डिम व्रजन्तु वीर सैनिकः&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;ये पंक्तिया नेताजी सुभाष चंद्र वोस अपनी सेना के सैनिको को आगे बढ़ने के लिए उत्साहित करने में करते हैं।&lt;br /&gt;कैसी रही, जरूर लिखें ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-2741422063839199974?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/2741422063839199974/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=2741422063839199974' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/2741422063839199974'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/2741422063839199974'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2008/03/blog-post_03.html' title='अथ श्री सत्यनारायण प्रथमोध्याय समाप्तः'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-8316787702936707964</id><published>2008-03-02T01:13:00.000-08:00</published><updated>2008-03-02T01:15:14.162-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास-परिहास'/><title type='text'>डिप्टी साहब का आतंक</title><content type='html'>देश का बजट चिदंबरम साहब ने पेश कर दिया है । खुशी मनाने वालों की तादाद ज्यादा है जबकि गमगीन तबका बहुत छोटा है । जो भी हो हम बजट की मीनाकुमारी नहीं करने जा रहे हैं । हर साल बजट आता है और आम जनता इसे एक नियति मान कर स्वीकार करती है । या आप लोग बताओ कि किसी बजट आने के बाद फलां चीज खरीदनी बंद कर दी या किसी आदत पर महंगी होने के कारण कंट्रोल कर लिया हो । नही न । तो फिर काहे की किलकिल । हो गया यार जो हो गया ।  टेँशन लेने का नहीं देने का । सभी के गाड़ी,फ्रिज.टेलीविजन,रोजमर्रा की चीजों पर विराम थोड़े लगेगा । महंगी हो या सस्ती । फर्क पड़ता है लेकिन होनी को कौन टाल सकता है ।&lt;br /&gt;खैर इस बहस में पड़ने की बजाय कुछ काम की बातें कर ली जाए । यह सब नेताओं के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए । इस बजट में क्या लगभग सभी बजट में सरकार का शिछा छेत्र में  खर्च की परिपाटी जीडीपी का लगभग ३ फीसदी से थोड़ा सा ज्यादा है । इससे ज्यादा तो चीन,कोरिया एवं ताईवान जैसे देश कर रहे हैं । इन देशों का एजुकेशन सेक्टर पर खर्च जीडीपी का पांच फीसदी से अधिक है किसी का सात फीसदी से भी ज्यादा है । भारत सरकार इससे थोड़ा ही कम गोला बारूद खरीदने यानि रछा छेत्र में करती है । तो आप ही बताइये हमारे भावी कर्णधार पढ़ लिखकर गण तंत्र चलाएगे या गनतंत्र संभालेंगे । इसके बानगी एक वाकया पेश करना चाहूंगा । इजाजत है । शुक्रिया आप लोगों की इजाजत का ।&lt;br /&gt;हां तो भइया अगर आप भी गांव गुरबे के किसी परायमरी (प्राइमरी) स्कूल के प्रोडक्ट होकर और आज कान्वेंट के लड़कों से मोहड़ा (मोर्चा)ले रहे है तो आप समझ गए होंगे पऱायमरी स्कूलों में डिप्टी साहब का आतंक । होता क्या है कि महीने चार महीने में इन स्कूलों में मानीटरिंग के लिए डिप्टी साहब दौरे पर आते हैं । लचर पढ़ाई और कुव्यवस्था होने के कारण इन स्कूलों के अध्यापकों में डर साफ झलकता है । सभी बच्चों को एक दिन पहले ही चेताया जाता है कि कल डिप्टी साहब आने वाले हैं साफ सुथरे कपड़े पहन कर आना । गदहा पार्टी छुट्टी भी कर सकती है । इतने भयभीत रहते थे अध्यापक की बच्चे भी उनके इस डर को भांप जाते थे । परिणामस्वरूप बच्चों में अध्यापकों से कई गुना डिप्टी साहब का खौफ घर कर जाता था । इसे आप अध्यापकों की अग्यानता ही कहेंगे कि डिप्टी साहब के बारे में सही जानकारी बच्चों को नहीं दी जाती थी ।&lt;br /&gt;लेकिन डिप्टी साहब के औचक निरीछण के दौरान अध्यापकों की फूंक सरक जाती थी । अप्रत्याशित दौरे से तैयारी का समय नहीं मिल पाता था । जो जैसा है उसी हाल में डिप्टी साहब सबसे मिलते थे । एक एक क्लास में विजिट करते हुए एक बार इसी तरह के औचक निरीछण के दौरान डिप्टी साहब कछा पांच में पहुंचे । परायमरी में कछा पांच सबसे बड़ी क्लास होती थी और उसे डायरेक्ट हेडमास्टर डील करते थे । हेडमास्टर साहब पढ़ा रहे थे । डिप्टी साहब के पहुंचने पर सब शांत हो गए । डिप्टी साहब ने पूंछा मास्टर साहब क्या पढ़ा रहे हो बच्चों को । उत्तर मिला हिंदी । बच्चों के आई क्यू टेस्ट के लिए डिप्टी साहब ने पूंछा बच्चों पर्यायवाची क्या होता है? कोई उत्तर नहीं आया? डिप्टी साहब ने क्लिष्ठ प्रश्न को थोड़ा और आसान करते हुए पूछा बच्चों बताओ कोई एक ही चीज हो और उसके नाम अलग अलग हों । कछा में मौत सा सन्नाटा । कोने से एक हाथ ऊपर उठा । ये हाथ था भुनगू शर्मा का । भुनगू के बारे में बताते चलें कि कछा में सबसे गदहा लड़का था । कुछ भेजे में घुसता ही नही था,अव्वल तो भेजा था ही नहीं । हेडमास्टर साहब के दिल की धड़कने १८० की रफ्तार में । सोच रहे थे सब गुड़ गोबर हो गया । क्लास का सबसे तेज लड़का क्यों नही हाथ खड़े कर रहा है । मन को सांत्वना भी दे रहे हैं शायद डर रहा है। खैर डिप्टी साहब के पीछे से हाथ से इशारा करके भुनगू को मना करने का हेडमास्टर का असफल प्रयास ताड़ गए डिप्टी साहब । हेडमास्टर को डांटते हुए बोले, बोलने दो बोलने दो, जब बच्चा बताने जा रहा है तो आप मना क्यों कर रहें हैं । भुनगू खड़े हुए बोले, गुरूजी बताई । डिप्टी साहब ने पुचकारते हुए कहा हां,बेटा बताओ । गुरूजी बार (बाल या हेयर)। डिप्टी साहब ने पूंछा ,कैसे ।&lt;br /&gt;भुनगू लगे व्याख्या करने । हाथ उठाकर अपने सिर पर रखते हुए भुनगू बोले, गुरूजी मूढे कय बार (सिर का बाल),बरौनी, मूंछ,दाढ़ी अऊर गुरूजी सीना कय बार अऊर गुरूजी.....&lt;br /&gt;हेडमास्टर साहब बड़ी तत्परता दिखाते हुए उसकी बात को बीच में ही काटते हुए चिल्लाए, बस भुनगू बस, अब और नीचे नहीं जाना । डिप्टी साहब भी भुनगू की इस सरलता पर मन ही मन मुस्कराए बिना नहीं रह सके।&lt;br /&gt;तो जनाब यह है हमारी प्राथमिक शिछा तंत्र का हाल । जब मास्टर ही अवेयर नहीं है तो छात्र तो बेचारे छात्र ही हैं।&lt;br /&gt;कैसी रही जरूर लिखे ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-8316787702936707964?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/8316787702936707964/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=8316787702936707964' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/8316787702936707964'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/8316787702936707964'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2008/03/blog-post.html' title='डिप्टी साहब का आतंक'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-3290132307075053595</id><published>2008-02-25T00:29:00.000-08:00</published><updated>2008-02-25T00:35:56.157-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हास-परिहास'/><title type='text'>देवलोक में भी खटमलों का प्रकोप</title><content type='html'>देवलोक में भी खटमलों का प्रकोप गर्मियां शुरू होने को हैं । मच्छरों एवं खटमलों के सक्रिय होने का समय आ रहा है । पूर्व में आए तमाम सर्वेछणों में बताया गया है कि तनाव या फलाने चीज के कारण नींद नहीं आ रही है लोगों को । एक तो करेला उस पर नीम चढा । अब ये आथ्रोपोडा संघ के राछस जीना हराम कर देंगे । टीवी पर एक से एक कीटनाशकों का प्रचार आता है लेकिन ये कीटनाशक इनके लिए टानिक का काम कर रहे हैं । इनकी प्रतिरछा प्रणाली कीटनाशक चाट चाट कर इतनी सुदृढ़ हो गयी है कि अब कीटनाशक इनके लिए इत्र हो गये हैं । इत्र लगाकर ये अपने काम को ज्यादा प्रभावी ढंग से अंजाम दे रहे हैं ।अब क्या किया जाय क्या तोड़ हो सकता है इन राछसों का । कैसे नींद पूरी करें । बगैर नींद पूरी किए हर छेत्र में आपका प्रदर्शन गड़बड़ा जाएगा । इस तरह से देश की पूरी वर्कफोर्स ही ढह जाएगी । आईटी और बीपीओ जिसके दम पर भारत महाशक्ति बनने का दंभ भरता है,इनके कर्मचारियों का तो रात भर जागरण और दिनभर आ-मरण हो जाएगा । खैर मैं बड़ा चिंतित हुआ । गहन सोच में डूब गया । सोचा कि यार ये अपने देवता लोग तो चारपाई पर सोते ही नहीं हैं । इस संदर्भ में कभी पढ़ा हुआ एक श्लोक याद आयाश्लोक कुछ इस प्रकार था&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;कमले कमला शेते, हरः शेते हिमालयः । &lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;छीराब्धौ च विष्णु शेते,मन्ये मत्कुढ़ शंकया ।।&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;देवियों और सज्जनों भावार्थ यह है कि कमल के पुष्प पर लछ्मी जी निवास करती है । देवादिदेव महादेव भगवान शिव जैसे देवता भी हिमालय पर्वत पर स्थान बनाए हुए है । वहीं तीनों लोकों के मालिक विष्णु भगवान छीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर नींद का परमसुख भोगते है । क्या कारण है ये लोग चारपाई का उपयोग नहीं करते है कहीं इसके पीछे खटमलों का भय तो नहीं है?&lt;br /&gt;किसी ने ठीक कहा है कि न सोने जैसा सुख,न रोने जैसा दुख । इस भवसागर रूपी पृथ्वी पर भी सबसे बड़ा सुख अच्छी नींद लेना है । जैसा कि आपने देखा कि देवलोक में भी इस सबसे बड़े सुख को अर्जित करने के लिए हमारे धुरंधर देवता भी चारपाई का प्रयोग नहीं कर रहे हैं ।इसलिए हे प्राणी हमें भी इस सुख को हासिल करने के लिए कुछ विकल्पों पर सोचना होगा ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-3290132307075053595?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/3290132307075053595/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=3290132307075053595' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/3290132307075053595'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/3290132307075053595'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2008/02/blog-post_25.html' title='देवलोक में भी खटमलों का प्रकोप'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-6605119660328678021</id><published>2008-02-24T00:37:00.000-08:00</published><updated>2008-02-24T00:39:06.360-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्तर्मन'/><title type='text'>गधा ,चितर देखता है?</title><content type='html'>कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन । बहुत याद आता है बचपन । बात जूनियर हाई स्कूल के दिनों की । स्कूल से घर आते थे हम लोग । बस्ता फेंका अम्मा ने झट से खाना दिया । दुआरे (घर के दरवाजे पर)पर गांव के अन्य हमउम्र लड़के आवाज दे रहे होते थे । जल्दी जल्दी खाना निपटाया । मां का कहना अनसुना कर हाथ पोछतें हुए लड़कों के दल में शामिल हो जाते थे ।कौन सा खेल खेलना है इस पर विचार शुरू होता था । प्रमुख खेलों में झाबर,शुर्र,कब्बडी,गेंद भड़ाक एवं सत्ता मुच्छ । क्रिकेट का चलन भी था लेकिन तब महंगा खेल हुआ करता था । बाबूजी से किसी तरह से कह सुनकर एक बैट मंगवाता तो सभी लोग उसी से खेलते । हालांकि बैट की हिफाजत के लिए नियम कानून बनाए जाते थे । बाजार वाले बैट से केवल रनिंग की जाएगी । गांव के हौसिला बढ़ई द्वारा बनाए गए लकड़ी के बैट से ही स्ट्रोक लगाए जाएंगे । अगर टूट जाता था तो दूसरा बन जाता था । बाग में पेड़ो की कमी नहीं थी । उस बैट से खेलने में एक बड़ी दिक्कत जो आती थी कि उससे बड़े स्ट्रोक नही लग पाते थे । बहुत वजनी होता था । इसलिए हम लोग ढेर(एक विशेष प्रकार का पेड़ जिसकी लकड़ी हल्की व मजबूत मानी जाती है । लेकिन इन पेड़ों की संख्या काफी कम होती है)के तने से बैट बनवाते थे । एक मात्र ढेर का पेड़ केवल हमारे पास था । उसका पेड़ं भी बहुत छोटा होता है तो कुल मिलाकर एक से ज्यादा बैट की बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं होती थी । बाजार वाले बैट का उपयोग हमलोग किसी दूसरे गांव से मैच के दौरान करते थे । यह स्टेटस सिंबल हुआ करता था । खौर दोनों प्रकार के बैट्स की गैरमौजूदगी में हम लोग ऊपर इंगित खेलों से अपना मनोरंजन करते थे । खूब मस्ती धमाचौकड़ी होती थी ।अंधेरा होने से पहले घर आना जरूरी होता था । घर आकर बड़े पिताजी के बाजार से आने से पहले पढ़ने बैठ जाया करते थे । लाइट नहीं है तो लालटेन जलाते थे। उसके शीशे को चूना लगाकर साफ करते थे । यह विधि हमको हमारे छोटे चाचाजी ने बताया था रामधे आप भी करके देखिए शीशा नया हो जाएगा । लालटेन जलाकर बैठे हुए कुछ ही समय बीतता इतने में बड़े पिताजी का बाजार से लौटने का समय नियत रहता था । सीरियस रहने वाले बड़े पिताजी को हम लोग सब डरते थे । किसी को बुलाकर साथ में लाए झोले को पकड़ाते हुए कहते थे बड़ी अम्मा को दे दो । इस झोले में बाजार से लायी तरकारी होती थी । उसके बाद हमलोगों के पढ़ने के स्थान पर आते थे और जिसकी जो जरूरत होती थी उसको कापी,किताब,कलम,ओमेगा स्याही इत्यादि देते थे । स्कूल वाला होमवर्क मैं इसी समय पूरा कर लेता था सुबह का कोई चक्कर नहीं छोड़ता था । सुबह होने पर इत्मीनान से केवल स्कूल जाना ही पसंद करता था । स्कूल में पहला घंटा संस्कृत का होता था । हमारे क्लास में एक सरदार मिश्र पढ़ते थे उम्र कुछ ज्यादा थी लेकिन पढ़ते सांतवी में थे । पढ़ने लिखने में मन नहीं लगता था । एक दिन संस्कृत टीचर कुछ पढ़ा रहे थे तो सरदार मिसिर किताब के पन्ने पलट रहे थे । पन्ने पलटने से शांत माहौल में एक आवाज मास्टर साहब को इरीटेट कर रही थी । मास्टर साहब ने सरदार को खड़ा करके पूंछा क्या कर रहे हो । सरदार ने कहा गुरूजी चित्र देख रहा हूं । मास्टर साहब ने गुस्से में कहा ,गधा चितर देखता है दो डंडे मारने के बाद क्लास से बाहर कर दिया । गुरूजी का यह  ऐतिहासिक वाक्य जुमले में बदल गया । उसके बाद सरदार को देखते ही सब लड़के गधा चितर देखता है के जुमले से संबोधित करते थे ।&lt;br /&gt;अगली पोस्ट में- कुछ मजेदार शरारतें&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-6605119660328678021?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/6605119660328678021/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=6605119660328678021' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/6605119660328678021'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/6605119660328678021'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2008/02/blog-post_24.html' title='गधा ,चितर देखता है?'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-1127448855320025494</id><published>2008-02-23T00:23:00.000-08:00</published><updated>2008-02-23T00:30:56.720-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आलाप'/><title type='text'>खतरे में मानवता</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R7_ZcSEuEPI/AAAAAAAAADI/wVOSzFYqMTU/s1600-h/computer-vs-human.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5170089977155817714" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R7_ZcSEuEPI/AAAAAAAAADI/wVOSzFYqMTU/s200/computer-vs-human.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;आपने ब्लेड रनर,टर्मिनेटर राइजिंग आफ मशीन श्रृंखला की फिल्में देखी होगी तो याद होगा किस तरह से तकनीकी का विकास मानव अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है ।जनाब ये केवल फिल्मों की बातें नहीं है ये कटु सत्य है । अभी इसी हफ्ते इस आशय की एक खबर आयी। लेकिन इस खबर को बहुत हल्के से लिया गया ।अमेरिका में मानवता के खिलाफ तकनीकी चुनौतियों की पहचान के लिए १८ लोगों का एक दल बनाया गया है। इस दल में छोटे मोटे लोग नहीं है अपने छेत्र के माहिर खिलाड़ी शामिल हैं । इंही १८ लोगों में से एक हैं अमेरिकन कम्प्यूटर गुरू रे कुर्जवील ।कुर्जवील ने अपने बयान में जो बातें कही है वो न केवल चौकाती है बल्कि सोचने पर विवश भी करती हैं ।कुर्जवील के अनुसार मानव दिमागी छमताओं से आगे निकल जाएंगी मशीनें । बींसवी सदी में जितना तकनीकी विकास हुआ उसका ३२ गुना ज्यादा विकास हम केवल इस आधी सदी में हासिल कर लेगें ।मशीनों में मानव जैसे तेज मस्तिष्क को विकसित किया जा सकेगा । आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस द्वारा मशीनें मानव को पछाड़ देगी । अगले दो दशकों में बुढ़ापे और बीमारियों पर रोक ही नहीं बल्कि उन्हे रिवर्स कर प्रभाव उत्तरोत्तर कम किया जा सकेगा । अब सवाल यह उठता है कि विग्यान वरदान है या अभिशाप । मानव सुविधाभोगी होता जा रहा है । आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है के नाम पर खोज पर खोज होती जा रही है । हमारे एक इशारे पर सब कुछ हाजिर होना चाहिए । रिमोट युक्त संचालन चलन में है । सबकुछ झमाझम चाहिए । आखिर इन सबकी परिणति क्या होगी । क्या कभी ऐसा भी वक्त आ सकता है जब मशीनें हमारे ऊपर राज करेंगी । आखिर सोचिए जब कोई ऐसी मशीन विकसित कल ली जाएंगी जो हर छेत्र में मानव से बीस होगी तो क्या होगा ।एक किस्सा याद आता है कि जब बिल्ली ने शेर को सारे गुण बता दिए तो शेर ने बिल्ली को ही खाने का मन बनाया । इरादा भांप कर बिल्ली पेड़ पर चढ़कर अपनी जान बचाती है । इसी तरह मान लेते हैं मानव जब इस तरह की मशीन बनाएगा तो जाहिर सी बात है उसका रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में रखेगा । लेकिन तब स्थिति क्या होगी जब किसी तरीके से रिमोट मशीन के कब्जे में होगा । सोचकर ही भयावह लगता है । संभल जाइये वरना हमारे अस्तित्व को कोई बचा नहीं पाएगा । प्रलय आएगी और सब कुछ खाक हो जाएगा । सृष्टि से खिलावाड़ बहुत महंगा पड़ सकता है ।आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस शब्द को पहली बार १९५६ में कंप्यूटर बैग्यानिक जान मैक्कार्थी ने प्रयोग किया ।एमआईटी के मार्विन मिंक्सी ने १९५० एवं ६० को दशकों में इस कांसेप्ट को फैलाया । साइंस फिक्शन लेखक आर्थर सी क्लार्क ने अपनी पुस्तकों में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस कांसेप्ट का खूब प्रयोग किया ।मानव बनाम मशीन जंग की शुरूआत १९९७ में ही शुरू हो चुकी थी । जब ११ मई १९९७ को विश्व शतरंज चैंपियन गैरी कास्पारोव को आईबीएम के कंप्यूटर डीप ब्लू ने धूल चटा दी थी । यह मानव की मशीन से पहली हार थी । ५ दिसंबर २००६ को एक बार फिर डीप फ्रिज ने विश्व शतरंज चैंपियन ब्लादीमीर क्रैमनिक को पिछाड़ा । जुलाई १९९७ में नासा के सोजोयुनर रोबोट रोबर ने मंगल ग्रह पर जाकर आवश्यक जानकारियां एकत्र की । अक्टूबर १९९८ में नासा ने डीप स्पेस १ आटोनामस स्पेसक्राफ्ट छोड़ा जिसका मकसद वहां जाकर ऐसी तकनीकी का पता लगाना था जिससे आगामी मिशन में केवल रोबोट को भेजा जा सके । इसी साल रेगिस्तान में आयोजित १३१ किमी. लंबी कार रेस में बिना रिहर्सल किए रोबोट कार चालक ने सबको पीछे छोड़ कर रेस अपने नाम की । मानवरहित जासूसी विमान आज देशों की जरूरत बन गए हैं । अप्रैल २००१ में ग्लोबल हाक रोबोटिक स्पाई प्लेन ने १३००० किमी. की उड़ान सकुशल तय की । ये सारे उद्धरण आप सबको डराने के लिए नहीं दे रहा हूं बल्कि ये सोचने पर विवश कर सकते हैं कि हम कहां जा रहे हैं । ग्लोबल वार्मिंग का भय अलग से तारी है । तकनीकी विकास द्वारा मशीनों को गुलाम बनाने वाले हम लोग कब तक सुरछित हैं । कभी न कभी तो ये गुलाम क्रांति करेंगे । आखिर बकरे की मां कब तक खैर मनाएंगी । और इन गुलामों की क्रांति (प्रलय) निश्चित तौर पर सृष्टि की अब तक की सबसे बड़ी क्रांति होगी&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-1127448855320025494?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/1127448855320025494/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=1127448855320025494' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/1127448855320025494'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/1127448855320025494'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2008/02/blog-post_23.html' title='खतरे में मानवता'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R7_ZcSEuEPI/AAAAAAAAADI/wVOSzFYqMTU/s72-c/computer-vs-human.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-5695144745777450533</id><published>2008-02-17T00:21:00.000-08:00</published><updated>2008-02-17T00:26:22.379-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आलाप'/><title type='text'>आइडियाबाज लाल बुझक्कड़ और संडे</title><content type='html'>आज संडे है । आमतौर पर संडे को फनडे माना जाता है । इसी विचार से प्रेरित होकर मैने आज किसी गंभीर विषय पर दार्शनिकता थोपने के बजाय लोगों का मनोरंजन एक-दो रोचक वाकये से करना चाह रहा हूं । लेकिन पहले एक बात साफ कर देना चाहता हूं कि अब थोड़ा बहुत जब अपने ब्लाग पर लिख लेता हूं तो ब्लागों पर क्या लिखा जा रहा है इसकी पूरी जानकारी रखता हूं । कल के ब्लाग पर एक बुद्धिजीवी और कई कथित बुद्धिजीवियों के बीच एक गंभीर मसले पर बहस छिड़ रखी थी । संभवतः वह आज भी जारी हो । इन महानुभावों के लिए बस इतना कहूंगा कि हर देश,धर्म,जाति,संप्रदाय एवं वर्ग का इतिहास उत्थान पतन से परिपूर्ण है । जो आज धूल धूसरित है वही कल पुष्प से सुवासित है । समय-चक्र परिवर्तनशील है । हां ये हो सकता है कि इस धीमी गति से परिवर्तन में लंबा समय लगे । इसलिए हे पार्थ धैर्य रखिए । सब्र का फल मीठा ही नहीं आनंददायी भी होता है । धीरे-धीरे रे मना धीरे सबकुछ होय । अधीर होने से कोई फायदा नहीं है । अब लोग तो बुद्धिजीवी है पन्ने पलटकर देखें तो बहस के विषय के विकास पर नजर अवश्य पड़ेगी । अब थोड़ा हल्का हो लें । लंबी सांसे लें फिर पढ़ें ।हां तो मै सबका मनोरंजन करना चाह रहा था । तो हुआ एक बार कुछ यूं एक शर्मा जी और एक वर्मा जी गहरे मित्र थे । संयोग से दोनों ही कुछ ऊंचा सुनते थे । एक बार वर्मा जी साइकिल से कहीं जा रहे थे । दूर खड़े शर्मा जी ने आवाज लगाई अरे वर्मा जी बाजार जा रहे हैं क्या ? वर्मा जी ने जोर बताया,नहीं नहीं बाजार जा रहा हूं । शर्मा जी ने फिर कहा, अच्छा अच्छा हम तो समझे कि बाजार जा रहे हो ।तो देवियों एवं सज्जनों इस तरह की बहस के कोई मायने नहीं हैं ।अब बात लाल बुझक्कड़ कीएक गांव में अल सुबह लोगों ने देखा कि डहर (पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में कच्ची पगडंडी को कहते हैं)में  चलने से बड़े बड़े पांवों के निशान पड़े थे । एक गंवई ने देखा तो हल्ला मचा दिया कि भइया ई कवन सा जानवर गया है?सारे गांववाले इकट्ठा हो गए । सभी लगे पहेली को बूझने । कोई कुछ कहता तो कोई कुछ? लेकिन बात हजम नहीं हो रही थी किसी को ? हजम होने का प्रमुख कारण था कि कोई तार्किक ढंग से बात को समझा नहीं पा रहा था । सभी लोगों ने ध्वनिमत से लाल बुझक्कड़ को पहेली सुलझाने के लिए बुलावा भेजा । लाल बुझक्कड़ इलाके में सबसे ज्यादा पढ़े लिखे जानकार होने के साथ साथ अपनी खुफियागीरी के लिए मशहूर थे । भाई लाल बुझक्कड़ आए । मौका मुआयना किया । कई कोणों से निशानों को बड़े ध्यान से जांचा परखा । उनके लिए खासतौर पर लायी गयी चारपाई पर बैठे । सारे लोग उनको घेर कर जमा हो गए । सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद लाल बुझक्कड़ ने आखिर गुत्थी सुलझा ही ली । फाइनल जजमेंट जो उन्होंने दिया वो कुछ इस प्रकार से था ।&lt;br /&gt;लाल बुझक्कड़ बुझ्य गय, और न बूझै कोयऔर पैर मा चकिया बाँध कय,हिरनै कूदा होय(भावार्थ यह है कि एक हिरण ने अपने पैर में पत्थर से बनी गोल सी चकिया को बांध कर कुलांचे भरता हुआ यहां से गुजरा है । अब आप सोचिए कि अगर हिरण के पैर में पत्थर की चकिया बांध दें तो क्या वह हिल पाएगा । वास्तविकता यह है कि उस रास्ते से हाथी गया था लेकिन हवा में आइडियावाजों की कमी थोड़े ही है।)रामू,इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?गुरूजी इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि बिना सोचे समझे बयानबाजी से बचना चाहिए । और अंधेर में तीर ही नहीं तुक्का भी नहीं मारना चाहिए ।इसलिए हे मानवश्रेष्ठ एक दूसरे पर दोषारोपण त्याग कर सहयोग की भावना से काम करें ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-5695144745777450533?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/5695144745777450533/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=5695144745777450533' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/5695144745777450533'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/5695144745777450533'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2008/02/blog-post_17.html' title='आइडियाबाज लाल बुझक्कड़ और संडे'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-7500912183709302746</id><published>2008-02-15T00:16:00.000-08:00</published><updated>2008-02-15T00:18:56.852-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कानों देखी'/><title type='text'>प्रेम और आर्कमिडीज का सिद्धांत</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R7VK2SEuEOI/AAAAAAAAADA/CfjITDBZ3NE/s1600-h/love.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5167118443902537954" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R7VK2SEuEOI/AAAAAAAAADA/CfjITDBZ3NE/s200/love.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;वैलेन्टाइंस डे की खुमारी आज भी सब पर तारी है । जैसे कोई बड़े प्रोजेक्ट को इन लोगों द्वारा सफलतापूर्वक अंजाम दे दिया गया हो । खैर बहुत चिंतन मनन के उपरांत मैने सोचा प्रेम को किसी थ्योरी से जोड़ा जाए । प्रेम क्यों होता है ये जगजाहिर हो चुका है । देह के अंदर होने वाले रसायनिक स्रावों के फलस्वरूप हमारा दिल और दिमाग विपरीत लिंगी के प्रति आकर्षित होता है । अब जब आकर्षित हो ही गया है तो इस संबंधों को स्थायित्व कैसे मिले सोचने की बात ये है । कामदेव के नुकीले तीर से घायल प्रेमी-प्रेमिका के बाद के समय को अगर आर्कमिडीज के सिद्धांत से जोड़े तो मजेदार तथ्य सामने आ रहे हैं ।सबसे पहले आर्कमिडीज का सिद्धांत समझना होगा । इस सिद्धांत के अनुसार जब कोई वस्तु किसी द्रव में पूर्ण या आंशिक रूप से डुबाई जाती है तो वस्तु जितना द्रव हटाती है नीचे से ऊपर की ओर वस्तु पर उतना ही बल लगता है । अगर वस्तु ज्यादा मात्रा में द्रव नहीं हटा पाती तो डूब जाती है । यही कारण है कि बड़ी जहाज तैरती है जबकि एक छोटी गोली पानी में डूब जाती है।अब इसको अगर प्रेम के सापेछ देखें तो अगर प्रेमी या प्रेमिका के व्यकित्व (नाम,पैसा,शोहरत,व्यकित्व आदि को मिलाकर) में ज्यादा अंतर है छोटे व्यकित्व वाला(चाहे वो प्रेमी हो या प्रेमिका)बड़े व्यकित्व वाले के प्रेम में डूब जाएगा । अब इसे चाहे असुरछा की भावना समझें या कुछ और समझने के लिए आप लोग स्वतंत्र है । तो दोनो के बीच प्रेम दिनों दिन प्रगाढ़ होता जाएगा । अपवाद तो हर जगह होते हैं लेकिन ऐसा मेरा मानना है । और यही अगर दोनों का व्यकित्व कमोबेश बराबर है तो एक दूसरे के प्यार में कभी नहीं डूब पाएंगे । इतिहास उदाहरणों से अटा पड़ा है । हो सकता है कि मैं गलत हूं आप लोगों की राय क्या है जरूर अवगत कराएं ।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-7500912183709302746?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/7500912183709302746/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=7500912183709302746' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/7500912183709302746'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/7500912183709302746'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2008/02/blog-post_15.html' title='प्रेम और आर्कमिडीज का सिद्धांत'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R7VK2SEuEOI/AAAAAAAAADA/CfjITDBZ3NE/s72-c/love.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-5476781304796489933</id><published>2008-02-14T00:16:00.000-08:00</published><updated>2008-02-14T00:26:35.828-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अन्तर्नाद'/><title type='text'>फैसनवा जियरा मारे सजनी</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R7P58CEuENI/AAAAAAAAAC4/aObv5Q1ElKo/s1600-h/fashion.bmp"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5166748007268225234" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; CURSOR: hand" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R7P58CEuENI/AAAAAAAAAC4/aObv5Q1ElKo/s320/fashion.bmp" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;आज वैलेंटाइन्स डे है । जागरूक युवा क्या कमोबेश सभी आयु वर्ग के लोग इस दिन सजने संवरने के लिए महीनों पहले से तैयारियां शुरू कर देते हैं । इस दिन के महात्म का अंदाजा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस बुजुर्ग दंपत्ति की बातचीत से लगाया जा सकता है । बस में सफर करते हुए सभी लोगों को वैलेंटाइन्स डे पर बहस करते हुए सुनकर महिला ने अधेड़ पति से पूछा आज के है? हमारे में जे करवा चौथ होवे वही ये लोग वेलेंटाइन बोले से ।खैर इस दिन की प्रासंगिकता की बहस में मै नहीं पड़ना चाहता आप लोग खुद बुद्धिमान हैं । इस पर साल दर साल पहले से ही बहुत बहस हो चुकी है । मैं तो केवल प्रैक्टिकल चीजें ही मानता हूं । पिछले साल कुछ चर्चित युगल इस दिन जीने मरने की कसमें खा रहे थे तो आज के दिन वे तलाक या मनमुटाव से अलग अलग रह रहें हैं । खैर मै मूल बिषय से भटकना नहीं चाह रहा हूं ।बात हो रही थी फैशन की । किसी भी दुकान पर जाओ तो एक पट्टी पर सूत्रवाक्य लिखा मिल जाएगा कि फैशन के इस दौर में गारंटी की इच्छा न करें । मन कुढ़ जाता है । साला फैशन करने वालों के लिए कोई गारंटी ही नही । हमारे बाबाजी की सोच फैशन के बारे में यूनीक थी । हम लोगों से वो कहा करते थे जानते हो फैशन कैसे बदलता है । जब आप टेलर के यहां सिलने के लिए कपड़े देने जाते हैं अगर कपड़ा अच्छी गुणवत्ता वाला होता है तो सिलते समय कुछ कपड़ा अपने जरूरत के लिए टेलर चुरा लेता है । आप जो माप देकर आते है उससे टाइट फिटिंग आती है । जब आप पहनकर बाहर निकलते हैं तो लोगों को अच्छा लगता है और एक नए फैशन का सूत्रपात हो जाता है ।दरअसल फैशन की शुरूआत भी उदारीकरण की देन है । आजकल गांवों में फैशन तेजी से फल फूल रहा है । लोगों की क्रय शक्ति में अमूलचूल इजाफा हुआ है । रिटेलिंग कंपनियां गांवों की तरफ भाग रही हैं । माल्स एवं शापिंग कांम्लेक्स खुल रहे हैं । रामदीन और नन्हकऊ जैसे लोकल बनियों की दुकानें ठप हो रही हैं । लोग शीशे और वातानुकूलित दुकानों में जाना पसंद कर रहें हैं । इनकी तमाम स्कीमें इनमें मदद कर रहीं हैं । ९० के दशक में जब गांवों में फैशन ने जोर पकड़ा तो लिखने वालों ने चार मजेदार लाइने लिखीं । पेश हैं वे चार लाइनें ।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;कल्लू सूरत बनवई खातिर पउडर रोज लगावैं ।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;कुटी सिल यस मुंह बा लेकिन गाल खूब चिकनावै ।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;चाहे घर मा मिलै न भर पेट भोजनवां&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;फैशनवां जियरा मारे सजनी ।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;सूट बूट पतलून और फैशन मा आई टाई&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;आंख बनी पर सूझत नाही कवन समय ई आई&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;चशमा राह दिखावै पकड़ कय दूनौ कनवा&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;फैशनवा जियरा मारै सजनी ।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;रंगई बुधई लेहे रेडियो सइकिल चढ़ कय ध्यावै&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;पान खाय का पइसा नाही लेकिन घड़ी लगावैं ।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;बन कय छैल चिकनवां घूयम सांझ भियहनवां&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;फैशनवां जियरा मारे सजनी&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-5476781304796489933?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/5476781304796489933/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=5476781304796489933' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/5476781304796489933'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/5476781304796489933'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2008/02/blog-post_14.html' title='फैसनवा जियरा मारे सजनी'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R7P58CEuENI/AAAAAAAAAC4/aObv5Q1ElKo/s72-c/fashion.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-22306604981499950</id><published>2008-02-07T00:33:00.000-08:00</published><updated>2008-02-08T00:00:47.872-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अंर्तनाद'/><title type='text'>फिर आज बात शादी की</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R6wHx2j5n5I/AAAAAAAAACk/FbXvpNwWEBU/s1600-h/child_marraige_3.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5164511425728192402" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R6wHx2j5n5I/AAAAAAAAACk/FbXvpNwWEBU/s200/child_marraige_3.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बात शादी की हो रही है । ला कमीशन ने शादी की उमर १८वर्ष तय करने के लिए अपनी शिफारिश कानून मंत्रालय को भेज दी है । देखिए होता है क्या । जब शादियों का निर्धारण स्वर्ग में होता है तो काहे की मगजमारी ये लोग कर रहे हैं । कितने लोग अभी तक २१ साल के नियम को कोई मानता थे? देश में बहुत कम जोड़े इस उम्र या ऊपर जाकर शादी करते हैं । जो थोड़ा आधुनिक विचारों से लैस हैं या अपने कैरियर के प्रति सजग है और अपने माता-पिता के दबाव को सहज सहन करने की छमता है रखते हैं । हालांकि छोटी उम्र में शादी कहीं से भी जायज नहीं है लेकिन लोग करते हैं खूब करते हैं । दो घटनाएं बताना चाहूंगा । बड़ी रोचक और जीवंत हैं।पहली घटना- पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में कुछ वर्गों में शादियां बहुत छोटी उम्र में ही कर दी जाती हैं। ऐसे ही एक बढ़ई परिवार है । इन लोगों में एक प्रथा है कि किसी खास मामले में लड़की लड़के के यहां आती है शादी रचाने । दूल्हा भगवानदीन करीब ६-७ साल का रहा होगा । रात को कर्मकांड होते होते देर हो गयी । भगवानदीन भाई वहीं बिछी दरी पर सो गए । पंडित जी ने कहा दूल्हे को बुलाओ फेरे लेने हैं । दूल्हे के पिताजी उठे और जोर जोर से हिलाकर दूल्हे को जगाने लगे । हे भगनी, भगनी उठा हो चला घूमै का बा । भगनी बेचारे नींद के आगोश में ऐसे पड़े कि उठने के नाम ही न लें । बहुत जोर जबरदस्ती करने पर नींद में ही बोल पड़े , दादा (पिताजी को दादा बोलते थे) हम न घूमब तू घूम ल्या । अब आप ही बताएं ऐसी शादी का क्या मतलब की दूल्हे दुल्हन को पता ही नही कि उनका क्या हो रहा है । आज भगवानदीन भाई आमदाबाद में ठेकेदार हैं। तीन चार बच्चे हैं सभी अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ रहें हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाली उमर में दूसरी शादी की घटना जो चकित ही नहीं करती बल्कि दुखित भी करती हैं ।बचपन में कुछ नया देखने या घूमने की ललक बच्चों में खूब होती है । इसी के चलते गांव में होनी वाली शादी में बारात जाने के लिए हम लोग तैयार रहते थे । एक ऐसी ही शादी में शारीक होने का मौका मिला । दूल्हा बामुश्किल ९ साल से ऊपर का रहा होगा । बाराज जिस दिन शाम को जाती है उसके दूसरे दिन सुबह एक रस्म अदा की जाती है जिसपर दूल्हे को सभी जरूरत की चीजें साइकिल,घड़ी बाजा इत्यादि दिया जाता है । इस रस्म को खिचड़ी खिलाना कहते है । दूल्हे को पहले ही समझा दिया जाता है कि जब तक सारी चीजें न मिल जाएं खाना नहीं खाना । जब सारी चीजें मिल जाएंगी तब फूफा या मामा या किसी विशेष व्यक्ति तुमसे खाने को कहेगा तो शुरूआत कर देना ।तो लौटते है प्रसंग पर दूल्हे मियां बैठे खिचड़ी खाने । जितनी चीजें देनी थी सब हाजिर की गयी । दूल्हे राजा तब भी न खाएं । लोग कह कह कर हार गए । दूल्हे के फूफा को बुलाया गया । वो भी मान मनौव्वल करते रहे । अन्ततः थक हारकर दूल्हे के पिताजी को बुलावा गया । पिताजी ने कान में फुसफुसाकर पूछा बेटा अब क्यों नहीं खा रहे हो । दूल्हे ने शरमाते हुए उसी आवृत्ति में जबाब दिया ‍‍बाबू हम लड्डू न खाब, दाल भात लेब । दरअसल होता क्या है कि सुबह खिचड़ी के समय खाने को लड्डू परोसा जाता है । जबकि बेचारे दूल्हे को सालों से कलेवे में दाल भात खाने की आदत थी । अब आप लोग ही तय करें कि इस तरह की शादी के मायने क्या हैं?&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-22306604981499950?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/22306604981499950/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=22306604981499950' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/22306604981499950'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/22306604981499950'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2008/02/blog-post_07.html' title='फिर आज बात शादी की'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R6wHx2j5n5I/AAAAAAAAACk/FbXvpNwWEBU/s72-c/child_marraige_3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-67329898654816928</id><published>2008-02-04T04:26:00.000-08:00</published><updated>2008-02-04T04:28:21.601-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चौपाल'/><title type='text'>बाबाजी की जुबानी</title><content type='html'>आज यदि मनु महराज पृथ्वी का अवलोकन कर मानव बुद्धि का चमत्कार देखें तो निश्चय ही दंग रह जाएंगें । सृष्टि उन्हें विचित्र दिखायी देगी । संभवत अपनी पुरानी आंखों से इस नवीन संसार को पहचान भी न पाएंगें । यह सब परिवर्तन इस संसार में कैसे हुआ यह हम भी जानते है और आप भी जानते हैं । अगर कोई नहीं जान पाएगा तो वो होंगे मनु महराज या हमारे बाबाजी जो अभी हाल में देश की राजधानी में आकर अपना इलाज करवाकर गए ।सबसे पहले अपने बाबाजी के बारे दो लाइनें । बतातें हैं कि बाबाजी बरम्हा (बर्मा वर्तमान में म्यांमार)की लड़ाई लड़े थे । रमून (रंगून) से आने के बाद गांव क्या पूरे पौस्त में ये रमूनिहा के नाम से मशहूर हैं । हमारे घर वाले आज भी रमून से आयी चीजें लोगों को दिखाते हुए गर्व महसूस करते हैं जिनमें दो बड़े ऊंचे ऊंचे पलंग जो साखू की लकड़ी से बने हैं और एक लालटेन एक आरामकुर्सी । अभी भी याद आता है िक जब हम लोग ऊचककर पलंग पर बैठने को होते थे तो बाबाजी जहां रहते वहीं से हड़काते ,,गोड़ पोंछ कै,,  । रमून से आने के बाद बाबाजी गोरू बछरू में रम गए । ज्यादा कहीं आते जाते नहीं थे । पेशी वेशी पर फैजाबाद कचेहरी चले जाते थे। खैर बहुत ही अनुशासन पसंद बाबाजी कहानियां भी खूब सुनाते थे। इस बार जब वे दिल्ली से गए तो उनके साथ जाने की ड्यूटी मेरी लग गयी । गांव पहुंचे । सुबह लोग दांतून करते हुए दरवाते पर आने लगे आते ही पूंछते रमूनिहा आय गयो हो का । शाम को जमावड़ा हुआ तो बाबाजी के किस्से खतम होने के नाम ही नहीं ले रहे थे ।बकौल बाबाजी जा राजू हियां कौनो सड़क अहै सड़क अहै तौ दिल्ली कै । महराज गड़िया मा बैठा रहा मजाल जौ पेटे कै पानी हील जाय । अउर दुकान तौ एक से एक । चाहे जवन लेया । घर से निसरतै सब चीजियै क दूकान । लेकिन बच्चा दिल्ली मा केहू के घरे जाय क बाद मा केवल सादा पानियय देय थै । बहुत बुरा लागत थै छूंछ पैलगी जिव झन्न । बाद भले चाय वाय लाय देय लकिन पहले तव चटकनै लागा थय । एक चीज जवन देखन मजा आय गय । मुझको संबोधित करते हुए हे बब्बू तू बतावा जवन हमय लैकय गय रह्या लोटवा गिनय वाली मशीनियां मा,हम बढिया से ना बताय पाउब । हम कहेन बतावा बाबा तोहरे बताये से ज्यादा मजा आए ।    बाबा शुरू हो गये । बब्बुआ हमय मोटरसाइकिली पै बैठाय कै लय गय । एक ठी छोट भरे कै कमरा रहा हो । वही मय एक मशीन लाग रही मशीनियां मा कुछ चौखिन्टा कै एक ठी चीज डरिस बस भइया खरखर खरखर पांच पांच सौ नोटिया गिरै लाग । सारे गांव वासी एक अच्छे श्रोता की तरह मंतर मुग्ध होकर सुन रहे थे । मैं सोच रहा था कि केवल मेरे बाबाजी ही नहीं अभी पूरे गांव वालों को बहुत कुछ जानना समझना है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-67329898654816928?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/67329898654816928/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=67329898654816928' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/67329898654816928'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/67329898654816928'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2008/02/blog-post_04.html' title='बाबाजी की जुबानी'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-1460820641876095365</id><published>2008-02-03T03:24:00.000-08:00</published><updated>2008-02-03T03:47:18.586-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यथा नामे तथा गुणे'/><title type='text'>रोज डेली ही क्यों !</title><content type='html'>निज भान्षा उन्नति अहै,सब उन्नति कै मूल । अगर इस बात पर गौर करें तो निश्चय ही हमारे विकास में अभी वक्त लगेगा । न्यूज़ चैनेलो पर खबर बांचती सुंदर कन्यायें अक्सर `मद्देनज़र देखते हुए ` कहते नही थकती । हद तो तब हो जाती है जब कई गणमान्य तथाकथित शिक्षित महानुभावों को ऐसी गलती करते हुए देखता या सुनता हूँ । कई लोगों को तो आप अक्सर `एकदम सेम ` बोलते हुए सुनते होंगे । हमारे एक बॉस है `दुबारा रिपीट करो ` जरूर बोलते है ।&lt;br /&gt;फ़ोन पर अम्मा बाबूजी अक्सर हिदायत देते रहते है `रोज- डेली `फल-फ्रूट ` खाया करो । थोडा शरीर पर ध्यान दो ।&lt;br /&gt;आशा है नामकरण आप लोगों को पसंद आएगा ।&lt;br /&gt;नोट : मेरा ब्लोग रोज डेली पढना न भूलें ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-1460820641876095365?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/1460820641876095365/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=1460820641876095365' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/1460820641876095365'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/1460820641876095365'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2008/02/blog-post.html' title='रोज डेली ही क्यों !'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-2740586269969498617</id><published>2008-01-29T00:53:00.000-08:00</published><updated>2008-02-04T00:36:24.116-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अंतर्नाद'/><title type='text'>टमाटर जनित दर्द</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R6bKiGj5nxI/AAAAAAAAABk/Ctr-oJDKO3I/s1600-h/tomato2.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5163036710052405010" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 74px; CURSOR: hand; HEIGHT: 78px" height="320" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R6bKiGj5nxI/AAAAAAAAABk/Ctr-oJDKO3I/s320/tomato2.jpg" width="228" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;आज सुबह रोज कि तरह अखबार बाचने बैठा तो एक अलग तरह कि अनुभूति हुई जिसको आप सबसे शेयर करने का मन कर रहा है।होता यह है कि आफिस मे जयादा जानकार दिखने के लिए मैं सुबह अखबार बहुत ही करीने से बांचता हूँ । आज भी इसी क्रम के दौरान नाश्ता भी आ गया । मेरा कन्सेंन्टेरेसन खबरों मे हो चूका था । अचानक चटनी के साथ परांठे खाते समय मुझे किसी चीज कि कमी महसूस हुई । मैंने वहीं से ग़ैर तवज्जो दिए आवाज लगाई अरे चटनी में टमाटर कम पड़ा है धनियाहीन आ रही है । अंदर से ही उत्तर सुनायी पड़ा । बीस रुपया किलो से कम ही नही हो रह है । रोज एक किलो आता है सुबह साम मे ख़त्म । इतने दाम मे तो डेढ़ किलो सेब मिल जाता है । आप कहते है न कि जीवन का मज़ा खट्टे में ही है । जनाब अब खट्टापन महंगा हो गया है। मेरा ध्यान ख़बरों से उचाट चूका था । मन पुरा खट्टा हो चूका था । टमाटर से जुडी खुच पुरानी यादे मस्तिस्क मे हथोड़ा से वार कर रहीं थी ।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-2740586269969498617?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/2740586269969498617/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=2740586269969498617' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/2740586269969498617'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/2740586269969498617'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2008/01/blog-post_4246.html' title='टमाटर जनित दर्द'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R6bKiGj5nxI/AAAAAAAAABk/Ctr-oJDKO3I/s72-c/tomato2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-4187374603542648194</id><published>2008-01-28T06:10:00.000-08:00</published><updated>2008-02-11T23:51:22.875-08:00</updated><title type='text'>बचत की नई परिभाषा, बाबा का सच्चा किस्सा</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R6wM2mj5n6I/AAAAAAAAACs/q3R6gJ8flWo/s1600-h/saving.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5164517004890709922" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; CURSOR: hand" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R6wM2mj5n6I/AAAAAAAAACs/q3R6gJ8flWo/s320/saving.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;एक रोचक किस्सा याद आया। मैं सुल्तानपुर में कमला नेहरू इंस्टीट्यूट से बीएससी कर रहा था। हफ्ते के अंत में गांव जाता था। एक दिन जैसे ही गांव के बस स्टैंड पर उतरा तो बगलवाले गांव के एक बाबा जी साइकिल पैदल लेकर जाते हुए मिल गए। इन बाबा जी का इलाके में बहुत सम्मान था। बताया जाता था कि पुराने ज़माने के इंटरमीडिएट हैं। उनको देखते ही खुद ब खुद अंदर से आदर भाव छलक आता था। पैलगी के बाद मैंने पूछा क्या हुआ बाबा? कैसे पैदल?बोले – क्या बताऊं बच्चा, गया था गोसाईंगंज। जैसे ही गोसाईंगंज से निकला, मड़हा पुल डांका कि साइकिल ससुरी पंक्चर हो गई। मैंने सवाल दागा कि फिर बनवाया क्यों नहीं? बाबा बोले – अरे, बच्चा, बनवाता कैसे? पुल से उतरकर पंक्चर बनानेवाले के पास गया। पूछा कितने पैसे लोगे। बताया 75 पैसे एक पंक्चर के। मोलतोल करके 65 पैसे पर मामला पट गया। एक ही पंक्चर था। बनाकर चक्का कस दिया। मैंने उसके साठ पैसे दिए। उसने मना कर दिया। कहने लगा – वाह, बाबा! बहुत चालाक हो। एक तो दस पैसे छुड़वा लिए, ऊपर से पांच पैसे भी कम दे रहे हो।बाबा जी का किस्सा जारी था। बोले – हमहूं ठान लिहे कि बच्चा अब देब तो साठय पैसा देब। फिर बच्चा, ऊ ससुर मनबय न करय। हम कहे कि ऐसा है मिस्त्री, तुम अपना लगाया पंक्चर खोल दो। मैं घर जाकर खुद ही बना लूंगा। मैं साठ से एक पैसा भी ज्यादा नहीं दूंगा। बच्चा, वो ससुर मिस्त्री बड़ा जिद्दी निकला। पांच पैसा कम नहीं किया और लगा पंक्चर खोलने। लगा तो बहुत बुरा। लेकिन मैंने कहा – खोलने दो स्याले को। उसने पंक्चर खोल डाला, चक्का कस दिया। मैं साइकिल लेकर चल पड़ा। उधर से टाटा (मिनी बस) आ रही थी। लाद दिया और यही अब जाकर पहुंचा हूं।मैंने पूछा – बाबा, टाटा पर तो आपके साथ साइकिल का अलग से किराया लगा होगा। बहुत ही स्वाभिमान से बाबा ने सीना चौड़ा करके जवाब दिया – हां, बच्चा, पांच रुपया अपना किराया दिया और साइकिल का मांग तो रहा था तीन रुपया, लेकिन दिया दो ही रुपया। अब घर पहुंच गया हूं। सब सामान है ही, कुछ खरीदना तो है नहीं। पंक्चर जोड़ लेंगे।&lt;br /&gt;मैंने कहा – ठीक है बाबा, आपको देर हो रही होगी। अब घर जाइए। बाबा ने हां में हां भरी। मैंने कहा – पायलागी बाबा। बाबा आशीर्वाद बच्चा आशीर्वाद कहते हुए निकल चुके थे। और मैं बचत की नई परिभाषा से जूझ रहाथा&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-4187374603542648194?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/4187374603542648194/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=4187374603542648194' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/4187374603542648194'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/4187374603542648194'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2008/01/blog-post.html' title='बचत की नई परिभाषा, बाबा का सच्चा किस्सा'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/SPio7nbeClI/AAAAAAAAAFY/_Atgc3xv92k/S220/Arvind.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_qS8ETWCpy14/R6wM2mj5n6I/AAAAAAAAACs/q3R6gJ8flWo/s72-c/saving.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6687850367897052792.post-2432489819019847653</id><published>2007-12-24T00:05:00.000-08:00</published><updated>2008-01-28T06:23:46.391-08:00</updated><title type='text'>नया साल २००८ मुबारक हो</title><content type='html'>नया साल सबके लिए खुशियाँ लेकर आ रहा है । लेकिन कुछ लोगों के लिए बुरी खबर है। अभी हाल में कुछ ज्योतिशाचार्यों ने एक खबर फैलाई । जिसके अनुसार २००८ में शादी का कोई मुहूर्त ही नही है । हमें ऐसे लोगों कि .....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6687850367897052792-2432489819019847653?l=rojdaily.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://rojdaily.blogspot.com/feeds/2432489819019847653/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=6687850367897052792&amp;postID=2432489819019847653' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/2432489819019847653'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6687850367897052792/posts/default/2432489819019847653'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://rojdaily.blogspot.com/2007/12/blog-post.html' title='नया साल २००८ मुबारक हो'/><author><name>अरविंद चतुर्वेदी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' 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