Saturday, October 23, 2010

पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब…


… और घड़ी की सूइयों ने तीन अक्टूबर के दिन शाम के सात बजा दिए। इसी के साथ १९वें राष्ट्रमंडल खेलों के उद्घाटन समारोह की औपचारिक शुरुआत हो गई। अब तक इन खेलों के बारे में अच्छा और केवल अच्छा बोलने, लिखने और पढ़ने की आदत भी बन चुकी थी। सच भी है, अंत भला तो सब भला। लेकिन अभी इसका समापन ११ दिन दूर है। हालांकि देश का एक सच्चा नागरिक होने के नाते हम सबको इसके सफल समापन की कामना करनी चाहिए। दुनिया में अपनी युवाशक्ति के बूते असाध्य को साध्य में तब्दील करने की माद्दा रखने वाले देश की इस खेल आयोजन ने खूब जगहसाई कराई। किरकरी करने का आलम यह था कि जो देश किसी भी क्षेत्र में हमारा पासंग भी नहीं है वे लोग भी कीचड़ उछालने में सबसे आगे रहे। ताज्जुब तो तब हुआ जब ऐन वक्त पर भी देसी मीडिया उत्साहवर्धक खबरें छापने के बजाय सांप मिलने की सफोटो हतोत्साहित खबरें प्रकाशित करने लगा। (हालांकि इस मामले में मेरे विचार गलत हो सकते हैं और इसमें व्यापक बहस की पूरी-पूरी गुंजायश है)। कई जगह तो नियिमत कालम तक शुरू हो चुके थे। विदेशी यहां आकर फेक स्टिंग आपरेशन कर हमारी ही धज्जियां उधेड़ने में लग चुके थे। लेकिन अब जब सफल शुरुआत हो चुकी है तो देश के अब तक के सबसे बड़े इस खेल आयोजन को सफलता के अंतिम मुकाम तक पहुंचाने की दिशा में प्रयास हर भारतवासी का प्रथम कर्तव्य बन जाता है। हम इतनी जगहसाई के पात्र बने, क्यों बने????????? कभी किसी ने सोचने समझने की शायद ही जहमत उठाई हो। प्रथमदृष्टया तो यही लगता है कि जब अपने माल में ही खोट है तो गैरों को क्या दोष दें, लेकिन बात यही खत्म नहीं होती मेरे दोस्त।

दरअसल इन राष्ट्रमंडल खेलों में अकूत धन झोंकने के बाद भी इस अंजाम के लिए किसी को दोषी मानना उचित नहीं लगता है। खेल की तैयारियों में साजिशन देरी करने और भ्रष्टाचार जैसे मामलों में संलिप्त रहे लोगों को सजा निश्चित तौर पर मिले, इसमें किसी को गिला-शिकवा नहीं होना चाहिए, लेकिन इन तब अल्पकालिक निदानों के साथ इस समस्या की जड़ का गहराई से अवलोकन किया जाना चाहिए।

दरअसल हमारे यहां खेल संस्कृति का ही परम अभाव है। जो अधिकारी इन खेलों की देखरेख कर रहे हैं उनके खून में ही नहीं है खेल। वे भी हम लोगों की तरह बचपन में खेलने के लिए मार खाए होंगे। इसीलिए तो राष्ट्रमंडल खेलों को इतनी सीरियसली नहीं लिया जा रहा है। कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक सबकी यही सोच हो गई है कि अरे यार हो जाएगा न। इस सोच के पीछे अनेकानेक कारण हैं जिनका खामियाजा आज देश की साख के साथ चुकाना पड़ रहा है।

एक अनुमान के मुताबिक हमारे देश में कुल दो फीसदी स्कूलों में ही प्ले ग्राउंड हैं। जो प्ले ग्राउंड हैं भी उनके बारे में यह खुशफहमी निकाल दीजिए कि पश्चिमी देशों की तरह इन खेल के मैदानों में खेल की सारी सुविधाएं मौजूद होगी। यहां तो स्कूल के आगे,पीछे या अगल, बगल छोटा सा खुला मैदान का टुकड़ा होता है जहां बच्चे केवल खुला खेल फर्रुखाबादी यानी केवल दौड़ लगा सकते हैं। उनको क्या पता कि फलां खेल में क्या क्या सुविधाएं होनी चाहिए। बहरहाल कुछ बच्चे तो शौकिया तौर पर खेलकूद में रुचि लेते हैं। स्कूल के बाद गांव या मुहल्ले के बच्चों के साथ खेल के शौक को पूरा करते हैं। लेकिन शौक चुपके-चुपके और भयावह डर के बीच पूरा होता है। अगर घर वालों को पता चल गया कि फलाने खेलने गए थे तो समझो खैर नहीं। इस परंपरागत मानसिकता के तहत हमारे यहां खेलने में समय को जाया करना समझा जाता है। नीति वचनानि के तहत खेलकर लौटते ही आपको मार के साथ पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे होगे खराब जैसा जुमला मुफ्त में सुनाया जाएगा। यह खेल को (खेल-कूद) फन या एंज्वाय करना माना जाता है। जब परंपरागत रूप से कभी हमने खेल को सीरियसली लिया ही नहीं तो हमारे ये अधिकारी भला इस मानसिकता का परित्याग कैसे करते। आखिर इनके पूर्वज भी तो इसी मानसिकता के ओत-प्रोत रहे हैं और क्या-पता कभी इनको भी बख्शीश में लात-घूंसे समय बर्बादी के चलते खाने पड़े हों।

इतिहास गवाह है दूसरे देश के नेताओं से अलग हमारे नेताओं ने कभी खेल में बहुत रुचि नहीं दिखाई। इसका ताजा सबूत है कि राष्ट्रमंडल खेलों की शुरुआत दो अक्टूबर के बाद हो रही है। जिस महापुरुष के जन्मतिथि के बाद इन खेलों की शुरुआत हो रही है, खेलों के प्रति उसकी विरक्ति जगजाहिर है। महापुरुष हैं इसीलिए तो यह सत्य भी इन्होंने अपनी आत्मकथा में स्वीकार कर लिया है। १९३२ में दुनिया में परचम लहराती भारतीय हाकी का लास एंजेल्सि खेलों में भागीदारी करने के लिए वित्तीय मदद के सवाल पर इन राष्ट्रपुरुष ने जवाब में सवाल दागकर कहा कि हाकी क्या है?

एक ये महापुरुष थे और एक वो महापुरुष था माओ। १९१७ में माओ ने जो पहला पत्र लिखा था उसका मजमून खेल की महत्ता पर आधारित था। चीन की तरह खेल हमारे देश में कभी केंद्रीय नीति का हिस्सा नहीं रहे। हालांकि देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने खेल के लिए थोड़ा बहुत किया भी। कम से कम पार्टी की नीतियों के खिलाफ जाकर राष्ट्रमंडल में देश को शामिल तो कराया। आज भले ही सभी खेल संघ नेताओं के चंगुल में लंबे समय से चले आ रहे हों लेकिन बीजिंग ओलंपिक में महज एक स्वर्ण की उपलब्धि एक अरब से ज्यादा की आबादी के लिए किसी तमाचे से कम नहीं है।

खेल जगत में अगर हमें देश को कोई मुकाम दिलाना है तो स्वामी विवेकानंद के पदचिह्नों पर चलना होगा। स्वामी विवेकानंद ने एक बार देशवासियों को भगवान प्राप्ति का एक सहज मार्ग सुझाया था। उन्होंने कहा था कि कोई भी व्यक्ति बहुत आसानी से भगवान को प्राप्त कर सकता है यदि वह घंटो किसी धार्मिक ग्रंथ को पढ़ने की बजाय फुटबाल खेले। आज जरूरत खेल संस्कृति विकसित करने की है न कि खिलाड़ी तैयार करने की या बड़े खेल आयोजन करवाकर मलाई काटने की।

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