Tuesday, July 29, 2008

उदासी

अक्सर जब होता हूं उदास
बैठता हूं लिखने को कविता
पेंसिल से कागज पर
केवल खींचता हूं लकीरें
लोग यह न कहें कि
यार तुम तो बन गए हो
लकीर के फकीर
इससे बचने के लिए
पहले खीचीं गयी रेखाओं
को आड़ी रेखाएं खींचकर काटता हूं
लेकिन यह क्या
बरबस बन जाता है एक अक्स
धुंधला सा नजर आता है एक चेहरा
अतीत में हो जाता हूं गुम
और हो जाता हूं
और उदास,और उदास बहुत उदास