अक्सर जब होता हूं उदास
बैठता हूं लिखने को कविता
पेंसिल से कागज पर
केवल खींचता हूं लकीरें
लोग यह न कहें कि
यार तुम तो बन गए हो
लकीर के फकीर
इससे बचने के लिए
पहले खीचीं गयी रेखाओं
को आड़ी रेखाएं खींचकर काटता हूं
लेकिन यह क्या
बरबस बन जाता है एक अक्स
धुंधला सा नजर आता है एक चेहरा
अतीत में हो जाता हूं गुम
और हो जाता हूं
और उदास,और उदास बहुत उदास
Tuesday, July 29, 2008
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