Sunday, April 6, 2008

आर्थिक बूम यही है का

सबसे पहले तो पिछले कुछ दिनों से गायब रहने के लिए माफी चाहूंगा । दरअसल जिंदगी की भाग दौड़ में
मन कब किस चीज से विरक्त हो जाए और कब किस पर आसक्त हो जाए,समझना टेढ़ी खीर है । खैर जब अब आ ही गए है तो सबको नमस्कार ठोंकना चाहूंगा ।
आज अखबार बांचते समय ध्यान गया एक खबर पर । दिल्ली ने जनसंख्या के हिसाब से मुंबई का रिकार्ड तोड़ दिया है । एक संस्था द्वारा किए गए अध्ययन में दिल्ली की आबादी २.२ करोड़ से ज्यादा है वहीं मुंबई की आबादी १.९४ करोड़ है ।
इसमें कोई संदेह की गुंजाइश नहीं है कि मुंबई अब भी सबसे ज्यादा भीड़ भाड़ वाला शहर है । यहां जनसंख्या घनत्व अब भी दिल्ली से कई गुना ज्यादा है।
खैर बात दिल्ली की हो रही थी। यहां की मुख्यमंत्री शीला दीछित पिछले नौ सालों से कुरसी पर विराजमान है । अपने बयानों से विवाद खड़े करना इनको शायद अच्छा लगता है। पिछले दिनों ब्लूलाइन से सडक दुर्घटनाओं पर बयान दिया कि इसके पीछे पैदल यात्री जिम्मेदार हैं । ये लोग संभलकर नहीं चलते । खूब हो हल्ला हुआ । बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश करने की दलीलें दी गयी। मामला आया गया हो गया ।
अभी कल के अखबार में महंगाई पर इनका एक और बयान छपा है । बयान में इन्होंने कहा कि महंगाई इसिलए है क्योंकि इकोनामी बूम कर रही है । लोगों के पास पैसा आ रहा है लोग चीजें ज्यादा खरीद रहें है । इसलिए वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे है।
अच्छा चलिए, मान लेते हैं कि लोगों के पास पैसा खूब आ रहा है तो कितना आलू टमाटर भिंडी गोभी खरीद कर डंप करोगे या दाल चावल तेल अनाज खाने की चीजें आदमी जरुरत भर का ही खरीदेगा । या साल भर का इकट्ठा भंडारण कर लेगा ।
माननीय मुख्यमंत्री जी को यह बात समझना चाहिए ।
दूसरी बात यह कि अगर मुद्रास्फीति बढ़ने और अर्थव्यवस्था के बूम में कोई सीधा संबंध होता तो जिंबाबे की अर्थव्यवस्था की विकास दर सब देशों से तेज होती । वहां मुद्रास्फीति १ लाख फीसदी से ज्यादा है । एक जून का भोजन करीब १.५ लाख डालर का पड़ रहा है । अब श्रीमती दीछित जी क्या बताएंगी कि जिंबाबे की विकास दर कितनी तेज है ।
सोचिए सात फीसदी मुद्रास्फीति में हमारे यहां आलम ये है तो वहां क्या होगा । सब्जी खरीदने जाओ तो दुकानदार पाव में भाव बताता है । सब्जी वाला हमारी हैसियत से वाकिफ होता है । उसको पता है कि फलां मद में भाई साहब एक निश्चित रकम ही खरचेंगे । जमीनी हकीकत यह है और बयानबाजी ये हो रही है कि लोग खूब खरीद रहे है जिससे महंगाई बढ़ रही है ।
एक किस्सा बताना चाहूंगा हमारे यहां गांव में कहावत है कि प्रायमरी के अध्यापक टमाटर कटवाकर खरीदते है । इसके पीछे की जो कहानी है वह इस प्रकार है ।
एक मास्टर साहब बाजार गए सब्जी खरीदने । ताजे बड़े-बड़े टमाटर देख कर अपने आपको रोक न सके।
कौतुक बस पूछ ही लिया दुकानदार से क्या रेट है भाई टमाटर,मास्टरजी मुहल्ले के सम्मानित व्यक्ति थे सो विनम्रता के साथ दुकानदार बोला माटसाब २० रु किलो । मास्टर साहब ने कहा बड़े महंगे लगा रखे हो यार । जबाब मिला क्या करें माटसाब मंडी से ही यही हाल है । ऊपर से किराया मार डाल रहा है ।
खैर चूंकि माटसाब दाम पूंछ ही चुके थे तो इज्जत बचाने के लिए लेना ही पड़ता । इसलिए बोले कि अच्छा ठीक है १०० ग्राम दे दो । अब दुकानदार के सारे टमाटर बड़े बड़े । कोई सौ ग्राम का नहीं सब ऊपर । हारकर उसने कहा माटसाब काट कर टमाटर नहीं बेंचता हूं ।
आश्चर्य न करें तब प्रायमरी के अध्यापक की तनख्वाह आज की तरह नहीं थी । तब ५०० रुपये में मन लगाकर पढ़ाते थे और अपने परिवार का भरण पोषण करते थे । अब हालत ये है कि ज्यादा तनख्वाह में भी पढ़ाने में मन नहीं लगता ।