Sunday, March 2, 2008

डिप्टी साहब का आतंक

देश का बजट चिदंबरम साहब ने पेश कर दिया है । खुशी मनाने वालों की तादाद ज्यादा है जबकि गमगीन तबका बहुत छोटा है । जो भी हो हम बजट की मीनाकुमारी नहीं करने जा रहे हैं । हर साल बजट आता है और आम जनता इसे एक नियति मान कर स्वीकार करती है । या आप लोग बताओ कि किसी बजट आने के बाद फलां चीज खरीदनी बंद कर दी या किसी आदत पर महंगी होने के कारण कंट्रोल कर लिया हो । नही न । तो फिर काहे की किलकिल । हो गया यार जो हो गया । टेँशन लेने का नहीं देने का । सभी के गाड़ी,फ्रिज.टेलीविजन,रोजमर्रा की चीजों पर विराम थोड़े लगेगा । महंगी हो या सस्ती । फर्क पड़ता है लेकिन होनी को कौन टाल सकता है ।
खैर इस बहस में पड़ने की बजाय कुछ काम की बातें कर ली जाए । यह सब नेताओं के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए । इस बजट में क्या लगभग सभी बजट में सरकार का शिछा छेत्र में खर्च की परिपाटी जीडीपी का लगभग ३ फीसदी से थोड़ा सा ज्यादा है । इससे ज्यादा तो चीन,कोरिया एवं ताईवान जैसे देश कर रहे हैं । इन देशों का एजुकेशन सेक्टर पर खर्च जीडीपी का पांच फीसदी से अधिक है किसी का सात फीसदी से भी ज्यादा है । भारत सरकार इससे थोड़ा ही कम गोला बारूद खरीदने यानि रछा छेत्र में करती है । तो आप ही बताइये हमारे भावी कर्णधार पढ़ लिखकर गण तंत्र चलाएगे या गनतंत्र संभालेंगे । इसके बानगी एक वाकया पेश करना चाहूंगा । इजाजत है । शुक्रिया आप लोगों की इजाजत का ।
हां तो भइया अगर आप भी गांव गुरबे के किसी परायमरी (प्राइमरी) स्कूल के प्रोडक्ट होकर और आज कान्वेंट के लड़कों से मोहड़ा (मोर्चा)ले रहे है तो आप समझ गए होंगे पऱायमरी स्कूलों में डिप्टी साहब का आतंक । होता क्या है कि महीने चार महीने में इन स्कूलों में मानीटरिंग के लिए डिप्टी साहब दौरे पर आते हैं । लचर पढ़ाई और कुव्यवस्था होने के कारण इन स्कूलों के अध्यापकों में डर साफ झलकता है । सभी बच्चों को एक दिन पहले ही चेताया जाता है कि कल डिप्टी साहब आने वाले हैं साफ सुथरे कपड़े पहन कर आना । गदहा पार्टी छुट्टी भी कर सकती है । इतने भयभीत रहते थे अध्यापक की बच्चे भी उनके इस डर को भांप जाते थे । परिणामस्वरूप बच्चों में अध्यापकों से कई गुना डिप्टी साहब का खौफ घर कर जाता था । इसे आप अध्यापकों की अग्यानता ही कहेंगे कि डिप्टी साहब के बारे में सही जानकारी बच्चों को नहीं दी जाती थी ।
लेकिन डिप्टी साहब के औचक निरीछण के दौरान अध्यापकों की फूंक सरक जाती थी । अप्रत्याशित दौरे से तैयारी का समय नहीं मिल पाता था । जो जैसा है उसी हाल में डिप्टी साहब सबसे मिलते थे । एक एक क्लास में विजिट करते हुए एक बार इसी तरह के औचक निरीछण के दौरान डिप्टी साहब कछा पांच में पहुंचे । परायमरी में कछा पांच सबसे बड़ी क्लास होती थी और उसे डायरेक्ट हेडमास्टर डील करते थे । हेडमास्टर साहब पढ़ा रहे थे । डिप्टी साहब के पहुंचने पर सब शांत हो गए । डिप्टी साहब ने पूंछा मास्टर साहब क्या पढ़ा रहे हो बच्चों को । उत्तर मिला हिंदी । बच्चों के आई क्यू टेस्ट के लिए डिप्टी साहब ने पूंछा बच्चों पर्यायवाची क्या होता है? कोई उत्तर नहीं आया? डिप्टी साहब ने क्लिष्ठ प्रश्न को थोड़ा और आसान करते हुए पूछा बच्चों बताओ कोई एक ही चीज हो और उसके नाम अलग अलग हों । कछा में मौत सा सन्नाटा । कोने से एक हाथ ऊपर उठा । ये हाथ था भुनगू शर्मा का । भुनगू के बारे में बताते चलें कि कछा में सबसे गदहा लड़का था । कुछ भेजे में घुसता ही नही था,अव्वल तो भेजा था ही नहीं । हेडमास्टर साहब के दिल की धड़कने १८० की रफ्तार में । सोच रहे थे सब गुड़ गोबर हो गया । क्लास का सबसे तेज लड़का क्यों नही हाथ खड़े कर रहा है । मन को सांत्वना भी दे रहे हैं शायद डर रहा है। खैर डिप्टी साहब के पीछे से हाथ से इशारा करके भुनगू को मना करने का हेडमास्टर का असफल प्रयास ताड़ गए डिप्टी साहब । हेडमास्टर को डांटते हुए बोले, बोलने दो बोलने दो, जब बच्चा बताने जा रहा है तो आप मना क्यों कर रहें हैं । भुनगू खड़े हुए बोले, गुरूजी बताई । डिप्टी साहब ने पुचकारते हुए कहा हां,बेटा बताओ । गुरूजी बार (बाल या हेयर)। डिप्टी साहब ने पूंछा ,कैसे ।
भुनगू लगे व्याख्या करने । हाथ उठाकर अपने सिर पर रखते हुए भुनगू बोले, गुरूजी मूढे कय बार (सिर का बाल),बरौनी, मूंछ,दाढ़ी अऊर गुरूजी सीना कय बार अऊर गुरूजी.....
हेडमास्टर साहब बड़ी तत्परता दिखाते हुए उसकी बात को बीच में ही काटते हुए चिल्लाए, बस भुनगू बस, अब और नीचे नहीं जाना । डिप्टी साहब भी भुनगू की इस सरलता पर मन ही मन मुस्कराए बिना नहीं रह सके।
तो जनाब यह है हमारी प्राथमिक शिछा तंत्र का हाल । जब मास्टर ही अवेयर नहीं है तो छात्र तो बेचारे छात्र ही हैं।
कैसी रही जरूर लिखे ।