Sunday, February 24, 2008

गधा ,चितर देखता है?

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन । बहुत याद आता है बचपन । बात जूनियर हाई स्कूल के दिनों की । स्कूल से घर आते थे हम लोग । बस्ता फेंका अम्मा ने झट से खाना दिया । दुआरे (घर के दरवाजे पर)पर गांव के अन्य हमउम्र लड़के आवाज दे रहे होते थे । जल्दी जल्दी खाना निपटाया । मां का कहना अनसुना कर हाथ पोछतें हुए लड़कों के दल में शामिल हो जाते थे ।कौन सा खेल खेलना है इस पर विचार शुरू होता था । प्रमुख खेलों में झाबर,शुर्र,कब्बडी,गेंद भड़ाक एवं सत्ता मुच्छ । क्रिकेट का चलन भी था लेकिन तब महंगा खेल हुआ करता था । बाबूजी से किसी तरह से कह सुनकर एक बैट मंगवाता तो सभी लोग उसी से खेलते । हालांकि बैट की हिफाजत के लिए नियम कानून बनाए जाते थे । बाजार वाले बैट से केवल रनिंग की जाएगी । गांव के हौसिला बढ़ई द्वारा बनाए गए लकड़ी के बैट से ही स्ट्रोक लगाए जाएंगे । अगर टूट जाता था तो दूसरा बन जाता था । बाग में पेड़ो की कमी नहीं थी । उस बैट से खेलने में एक बड़ी दिक्कत जो आती थी कि उससे बड़े स्ट्रोक नही लग पाते थे । बहुत वजनी होता था । इसलिए हम लोग ढेर(एक विशेष प्रकार का पेड़ जिसकी लकड़ी हल्की व मजबूत मानी जाती है । लेकिन इन पेड़ों की संख्या काफी कम होती है)के तने से बैट बनवाते थे । एक मात्र ढेर का पेड़ केवल हमारे पास था । उसका पेड़ं भी बहुत छोटा होता है तो कुल मिलाकर एक से ज्यादा बैट की बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं होती थी । बाजार वाले बैट का उपयोग हमलोग किसी दूसरे गांव से मैच के दौरान करते थे । यह स्टेटस सिंबल हुआ करता था । खौर दोनों प्रकार के बैट्स की गैरमौजूदगी में हम लोग ऊपर इंगित खेलों से अपना मनोरंजन करते थे । खूब मस्ती धमाचौकड़ी होती थी ।अंधेरा होने से पहले घर आना जरूरी होता था । घर आकर बड़े पिताजी के बाजार से आने से पहले पढ़ने बैठ जाया करते थे । लाइट नहीं है तो लालटेन जलाते थे। उसके शीशे को चूना लगाकर साफ करते थे । यह विधि हमको हमारे छोटे चाचाजी ने बताया था रामधे आप भी करके देखिए शीशा नया हो जाएगा । लालटेन जलाकर बैठे हुए कुछ ही समय बीतता इतने में बड़े पिताजी का बाजार से लौटने का समय नियत रहता था । सीरियस रहने वाले बड़े पिताजी को हम लोग सब डरते थे । किसी को बुलाकर साथ में लाए झोले को पकड़ाते हुए कहते थे बड़ी अम्मा को दे दो । इस झोले में बाजार से लायी तरकारी होती थी । उसके बाद हमलोगों के पढ़ने के स्थान पर आते थे और जिसकी जो जरूरत होती थी उसको कापी,किताब,कलम,ओमेगा स्याही इत्यादि देते थे । स्कूल वाला होमवर्क मैं इसी समय पूरा कर लेता था सुबह का कोई चक्कर नहीं छोड़ता था । सुबह होने पर इत्मीनान से केवल स्कूल जाना ही पसंद करता था । स्कूल में पहला घंटा संस्कृत का होता था । हमारे क्लास में एक सरदार मिश्र पढ़ते थे उम्र कुछ ज्यादा थी लेकिन पढ़ते सांतवी में थे । पढ़ने लिखने में मन नहीं लगता था । एक दिन संस्कृत टीचर कुछ पढ़ा रहे थे तो सरदार मिसिर किताब के पन्ने पलट रहे थे । पन्ने पलटने से शांत माहौल में एक आवाज मास्टर साहब को इरीटेट कर रही थी । मास्टर साहब ने सरदार को खड़ा करके पूंछा क्या कर रहे हो । सरदार ने कहा गुरूजी चित्र देख रहा हूं । मास्टर साहब ने गुस्से में कहा ,गधा चितर देखता है दो डंडे मारने के बाद क्लास से बाहर कर दिया । गुरूजी का यह ऐतिहासिक वाक्य जुमले में बदल गया । उसके बाद सरदार को देखते ही सब लड़के गधा चितर देखता है के जुमले से संबोधित करते थे ।
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