Saturday, February 23, 2008

खतरे में मानवता


आपने ब्लेड रनर,टर्मिनेटर राइजिंग आफ मशीन श्रृंखला की फिल्में देखी होगी तो याद होगा किस तरह से तकनीकी का विकास मानव अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है ।जनाब ये केवल फिल्मों की बातें नहीं है ये कटु सत्य है । अभी इसी हफ्ते इस आशय की एक खबर आयी। लेकिन इस खबर को बहुत हल्के से लिया गया ।अमेरिका में मानवता के खिलाफ तकनीकी चुनौतियों की पहचान के लिए १८ लोगों का एक दल बनाया गया है। इस दल में छोटे मोटे लोग नहीं है अपने छेत्र के माहिर खिलाड़ी शामिल हैं । इंही १८ लोगों में से एक हैं अमेरिकन कम्प्यूटर गुरू रे कुर्जवील ।कुर्जवील ने अपने बयान में जो बातें कही है वो न केवल चौकाती है बल्कि सोचने पर विवश भी करती हैं ।कुर्जवील के अनुसार मानव दिमागी छमताओं से आगे निकल जाएंगी मशीनें । बींसवी सदी में जितना तकनीकी विकास हुआ उसका ३२ गुना ज्यादा विकास हम केवल इस आधी सदी में हासिल कर लेगें ।मशीनों में मानव जैसे तेज मस्तिष्क को विकसित किया जा सकेगा । आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस द्वारा मशीनें मानव को पछाड़ देगी । अगले दो दशकों में बुढ़ापे और बीमारियों पर रोक ही नहीं बल्कि उन्हे रिवर्स कर प्रभाव उत्तरोत्तर कम किया जा सकेगा । अब सवाल यह उठता है कि विग्यान वरदान है या अभिशाप । मानव सुविधाभोगी होता जा रहा है । आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है के नाम पर खोज पर खोज होती जा रही है । हमारे एक इशारे पर सब कुछ हाजिर होना चाहिए । रिमोट युक्त संचालन चलन में है । सबकुछ झमाझम चाहिए । आखिर इन सबकी परिणति क्या होगी । क्या कभी ऐसा भी वक्त आ सकता है जब मशीनें हमारे ऊपर राज करेंगी । आखिर सोचिए जब कोई ऐसी मशीन विकसित कल ली जाएंगी जो हर छेत्र में मानव से बीस होगी तो क्या होगा ।एक किस्सा याद आता है कि जब बिल्ली ने शेर को सारे गुण बता दिए तो शेर ने बिल्ली को ही खाने का मन बनाया । इरादा भांप कर बिल्ली पेड़ पर चढ़कर अपनी जान बचाती है । इसी तरह मान लेते हैं मानव जब इस तरह की मशीन बनाएगा तो जाहिर सी बात है उसका रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में रखेगा । लेकिन तब स्थिति क्या होगी जब किसी तरीके से रिमोट मशीन के कब्जे में होगा । सोचकर ही भयावह लगता है । संभल जाइये वरना हमारे अस्तित्व को कोई बचा नहीं पाएगा । प्रलय आएगी और सब कुछ खाक हो जाएगा । सृष्टि से खिलावाड़ बहुत महंगा पड़ सकता है ।आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस शब्द को पहली बार १९५६ में कंप्यूटर बैग्यानिक जान मैक्कार्थी ने प्रयोग किया ।एमआईटी के मार्विन मिंक्सी ने १९५० एवं ६० को दशकों में इस कांसेप्ट को फैलाया । साइंस फिक्शन लेखक आर्थर सी क्लार्क ने अपनी पुस्तकों में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस कांसेप्ट का खूब प्रयोग किया ।मानव बनाम मशीन जंग की शुरूआत १९९७ में ही शुरू हो चुकी थी । जब ११ मई १९९७ को विश्व शतरंज चैंपियन गैरी कास्पारोव को आईबीएम के कंप्यूटर डीप ब्लू ने धूल चटा दी थी । यह मानव की मशीन से पहली हार थी । ५ दिसंबर २००६ को एक बार फिर डीप फ्रिज ने विश्व शतरंज चैंपियन ब्लादीमीर क्रैमनिक को पिछाड़ा । जुलाई १९९७ में नासा के सोजोयुनर रोबोट रोबर ने मंगल ग्रह पर जाकर आवश्यक जानकारियां एकत्र की । अक्टूबर १९९८ में नासा ने डीप स्पेस १ आटोनामस स्पेसक्राफ्ट छोड़ा जिसका मकसद वहां जाकर ऐसी तकनीकी का पता लगाना था जिससे आगामी मिशन में केवल रोबोट को भेजा जा सके । इसी साल रेगिस्तान में आयोजित १३१ किमी. लंबी कार रेस में बिना रिहर्सल किए रोबोट कार चालक ने सबको पीछे छोड़ कर रेस अपने नाम की । मानवरहित जासूसी विमान आज देशों की जरूरत बन गए हैं । अप्रैल २००१ में ग्लोबल हाक रोबोटिक स्पाई प्लेन ने १३००० किमी. की उड़ान सकुशल तय की । ये सारे उद्धरण आप सबको डराने के लिए नहीं दे रहा हूं बल्कि ये सोचने पर विवश कर सकते हैं कि हम कहां जा रहे हैं । ग्लोबल वार्मिंग का भय अलग से तारी है । तकनीकी विकास द्वारा मशीनों को गुलाम बनाने वाले हम लोग कब तक सुरछित हैं । कभी न कभी तो ये गुलाम क्रांति करेंगे । आखिर बकरे की मां कब तक खैर मनाएंगी । और इन गुलामों की क्रांति (प्रलय) निश्चित तौर पर सृष्टि की अब तक की सबसे बड़ी क्रांति होगी