आज संडे है । आमतौर पर संडे को फनडे माना जाता है । इसी विचार से प्रेरित होकर मैने आज किसी गंभीर विषय पर दार्शनिकता थोपने के बजाय लोगों का मनोरंजन एक-दो रोचक वाकये से करना चाह रहा हूं । लेकिन पहले एक बात साफ कर देना चाहता हूं कि अब थोड़ा बहुत जब अपने ब्लाग पर लिख लेता हूं तो ब्लागों पर क्या लिखा जा रहा है इसकी पूरी जानकारी रखता हूं । कल के ब्लाग पर एक बुद्धिजीवी और कई कथित बुद्धिजीवियों के बीच एक गंभीर मसले पर बहस छिड़ रखी थी । संभवतः वह आज भी जारी हो । इन महानुभावों के लिए बस इतना कहूंगा कि हर देश,धर्म,जाति,संप्रदाय एवं वर्ग का इतिहास उत्थान पतन से परिपूर्ण है । जो आज धूल धूसरित है वही कल पुष्प से सुवासित है । समय-चक्र परिवर्तनशील है । हां ये हो सकता है कि इस धीमी गति से परिवर्तन में लंबा समय लगे । इसलिए हे पार्थ धैर्य रखिए । सब्र का फल मीठा ही नहीं आनंददायी भी होता है । धीरे-धीरे रे मना धीरे सबकुछ होय । अधीर होने से कोई फायदा नहीं है । अब लोग तो बुद्धिजीवी है पन्ने पलटकर देखें तो बहस के विषय के विकास पर नजर अवश्य पड़ेगी । अब थोड़ा हल्का हो लें । लंबी सांसे लें फिर पढ़ें ।हां तो मै सबका मनोरंजन करना चाह रहा था । तो हुआ एक बार कुछ यूं एक शर्मा जी और एक वर्मा जी गहरे मित्र थे । संयोग से दोनों ही कुछ ऊंचा सुनते थे । एक बार वर्मा जी साइकिल से कहीं जा रहे थे । दूर खड़े शर्मा जी ने आवाज लगाई अरे वर्मा जी बाजार जा रहे हैं क्या ? वर्मा जी ने जोर बताया,नहीं नहीं बाजार जा रहा हूं । शर्मा जी ने फिर कहा, अच्छा अच्छा हम तो समझे कि बाजार जा रहे हो ।तो देवियों एवं सज्जनों इस तरह की बहस के कोई मायने नहीं हैं ।अब बात लाल बुझक्कड़ कीएक गांव में अल सुबह लोगों ने देखा कि डहर (पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में कच्ची पगडंडी को कहते हैं)में चलने से बड़े बड़े पांवों के निशान पड़े थे । एक गंवई ने देखा तो हल्ला मचा दिया कि भइया ई कवन सा जानवर गया है?सारे गांववाले इकट्ठा हो गए । सभी लगे पहेली को बूझने । कोई कुछ कहता तो कोई कुछ? लेकिन बात हजम नहीं हो रही थी किसी को ? हजम होने का प्रमुख कारण था कि कोई तार्किक ढंग से बात को समझा नहीं पा रहा था । सभी लोगों ने ध्वनिमत से लाल बुझक्कड़ को पहेली सुलझाने के लिए बुलावा भेजा । लाल बुझक्कड़ इलाके में सबसे ज्यादा पढ़े लिखे जानकार होने के साथ साथ अपनी खुफियागीरी के लिए मशहूर थे । भाई लाल बुझक्कड़ आए । मौका मुआयना किया । कई कोणों से निशानों को बड़े ध्यान से जांचा परखा । उनके लिए खासतौर पर लायी गयी चारपाई पर बैठे । सारे लोग उनको घेर कर जमा हो गए । सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद लाल बुझक्कड़ ने आखिर गुत्थी सुलझा ही ली । फाइनल जजमेंट जो उन्होंने दिया वो कुछ इस प्रकार से था ।
लाल बुझक्कड़ बुझ्य गय, और न बूझै कोयऔर पैर मा चकिया बाँध कय,हिरनै कूदा होय(भावार्थ यह है कि एक हिरण ने अपने पैर में पत्थर से बनी गोल सी चकिया को बांध कर कुलांचे भरता हुआ यहां से गुजरा है । अब आप सोचिए कि अगर हिरण के पैर में पत्थर की चकिया बांध दें तो क्या वह हिल पाएगा । वास्तविकता यह है कि उस रास्ते से हाथी गया था लेकिन हवा में आइडियावाजों की कमी थोड़े ही है।)रामू,इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?गुरूजी इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि बिना सोचे समझे बयानबाजी से बचना चाहिए । और अंधेर में तीर ही नहीं तुक्का भी नहीं मारना चाहिए ।इसलिए हे मानवश्रेष्ठ एक दूसरे पर दोषारोपण त्याग कर सहयोग की भावना से काम करें ।
Sunday, February 17, 2008
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