
बात शादी की हो रही है । ला कमीशन ने शादी की उमर १८वर्ष तय करने के लिए अपनी शिफारिश कानून मंत्रालय को भेज दी है । देखिए होता है क्या । जब शादियों का निर्धारण स्वर्ग में होता है तो काहे की मगजमारी ये लोग कर रहे हैं । कितने लोग अभी तक २१ साल के नियम को कोई मानता थे? देश में बहुत कम जोड़े इस उम्र या ऊपर जाकर शादी करते हैं । जो थोड़ा आधुनिक विचारों से लैस हैं या अपने कैरियर के प्रति सजग है और अपने माता-पिता के दबाव को सहज सहन करने की छमता है रखते हैं । हालांकि छोटी उम्र में शादी कहीं से भी जायज नहीं है लेकिन लोग करते हैं खूब करते हैं । दो घटनाएं बताना चाहूंगा । बड़ी रोचक और जीवंत हैं।पहली घटना- पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में कुछ वर्गों में शादियां बहुत छोटी उम्र में ही कर दी जाती हैं। ऐसे ही एक बढ़ई परिवार है । इन लोगों में एक प्रथा है कि किसी खास मामले में लड़की लड़के के यहां आती है शादी रचाने । दूल्हा भगवानदीन करीब ६-७ साल का रहा होगा । रात को कर्मकांड होते होते देर हो गयी । भगवानदीन भाई वहीं बिछी दरी पर सो गए । पंडित जी ने कहा दूल्हे को बुलाओ फेरे लेने हैं । दूल्हे के पिताजी उठे और जोर जोर से हिलाकर दूल्हे को जगाने लगे । हे भगनी, भगनी उठा हो चला घूमै का बा । भगनी बेचारे नींद के आगोश में ऐसे पड़े कि उठने के नाम ही न लें । बहुत जोर जबरदस्ती करने पर नींद में ही बोल पड़े , दादा (पिताजी को दादा बोलते थे) हम न घूमब तू घूम ल्या । अब आप ही बताएं ऐसी शादी का क्या मतलब की दूल्हे दुल्हन को पता ही नही कि उनका क्या हो रहा है । आज भगवानदीन भाई आमदाबाद में ठेकेदार हैं। तीन चार बच्चे हैं सभी अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ रहें हैं।
बाली उमर में दूसरी शादी की घटना जो चकित ही नहीं करती बल्कि दुखित भी करती हैं ।बचपन में कुछ नया देखने या घूमने की ललक बच्चों में खूब होती है । इसी के चलते गांव में होनी वाली शादी में बारात जाने के लिए हम लोग तैयार रहते थे । एक ऐसी ही शादी में शारीक होने का मौका मिला । दूल्हा बामुश्किल ९ साल से ऊपर का रहा होगा । बाराज जिस दिन शाम को जाती है उसके दूसरे दिन सुबह एक रस्म अदा की जाती है जिसपर दूल्हे को सभी जरूरत की चीजें साइकिल,घड़ी बाजा इत्यादि दिया जाता है । इस रस्म को खिचड़ी खिलाना कहते है । दूल्हे को पहले ही समझा दिया जाता है कि जब तक सारी चीजें न मिल जाएं खाना नहीं खाना । जब सारी चीजें मिल जाएंगी तब फूफा या मामा या किसी विशेष व्यक्ति तुमसे खाने को कहेगा तो शुरूआत कर देना ।तो लौटते है प्रसंग पर दूल्हे मियां बैठे खिचड़ी खाने । जितनी चीजें देनी थी सब हाजिर की गयी । दूल्हे राजा तब भी न खाएं । लोग कह कह कर हार गए । दूल्हे के फूफा को बुलाया गया । वो भी मान मनौव्वल करते रहे । अन्ततः थक हारकर दूल्हे के पिताजी को बुलावा गया । पिताजी ने कान में फुसफुसाकर पूछा बेटा अब क्यों नहीं खा रहे हो । दूल्हे ने शरमाते हुए उसी आवृत्ति में जबाब दिया बाबू हम लड्डू न खाब, दाल भात लेब । दरअसल होता क्या है कि सुबह खिचड़ी के समय खाने को लड्डू परोसा जाता है । जबकि बेचारे दूल्हे को सालों से कलेवे में दाल भात खाने की आदत थी । अब आप लोग ही तय करें कि इस तरह की शादी के मायने क्या हैं?
बाली उमर में दूसरी शादी की घटना जो चकित ही नहीं करती बल्कि दुखित भी करती हैं ।बचपन में कुछ नया देखने या घूमने की ललक बच्चों में खूब होती है । इसी के चलते गांव में होनी वाली शादी में बारात जाने के लिए हम लोग तैयार रहते थे । एक ऐसी ही शादी में शारीक होने का मौका मिला । दूल्हा बामुश्किल ९ साल से ऊपर का रहा होगा । बाराज जिस दिन शाम को जाती है उसके दूसरे दिन सुबह एक रस्म अदा की जाती है जिसपर दूल्हे को सभी जरूरत की चीजें साइकिल,घड़ी बाजा इत्यादि दिया जाता है । इस रस्म को खिचड़ी खिलाना कहते है । दूल्हे को पहले ही समझा दिया जाता है कि जब तक सारी चीजें न मिल जाएं खाना नहीं खाना । जब सारी चीजें मिल जाएंगी तब फूफा या मामा या किसी विशेष व्यक्ति तुमसे खाने को कहेगा तो शुरूआत कर देना ।तो लौटते है प्रसंग पर दूल्हे मियां बैठे खिचड़ी खाने । जितनी चीजें देनी थी सब हाजिर की गयी । दूल्हे राजा तब भी न खाएं । लोग कह कह कर हार गए । दूल्हे के फूफा को बुलाया गया । वो भी मान मनौव्वल करते रहे । अन्ततः थक हारकर दूल्हे के पिताजी को बुलावा गया । पिताजी ने कान में फुसफुसाकर पूछा बेटा अब क्यों नहीं खा रहे हो । दूल्हे ने शरमाते हुए उसी आवृत्ति में जबाब दिया बाबू हम लड्डू न खाब, दाल भात लेब । दरअसल होता क्या है कि सुबह खिचड़ी के समय खाने को लड्डू परोसा जाता है । जबकि बेचारे दूल्हे को सालों से कलेवे में दाल भात खाने की आदत थी । अब आप लोग ही तय करें कि इस तरह की शादी के मायने क्या हैं?


