Monday, February 4, 2008
बाबाजी की जुबानी
आज यदि मनु महराज पृथ्वी का अवलोकन कर मानव बुद्धि का चमत्कार देखें तो निश्चय ही दंग रह जाएंगें । सृष्टि उन्हें विचित्र दिखायी देगी । संभवत अपनी पुरानी आंखों से इस नवीन संसार को पहचान भी न पाएंगें । यह सब परिवर्तन इस संसार में कैसे हुआ यह हम भी जानते है और आप भी जानते हैं । अगर कोई नहीं जान पाएगा तो वो होंगे मनु महराज या हमारे बाबाजी जो अभी हाल में देश की राजधानी में आकर अपना इलाज करवाकर गए ।सबसे पहले अपने बाबाजी के बारे दो लाइनें । बतातें हैं कि बाबाजी बरम्हा (बर्मा वर्तमान में म्यांमार)की लड़ाई लड़े थे । रमून (रंगून) से आने के बाद गांव क्या पूरे पौस्त में ये रमूनिहा के नाम से मशहूर हैं । हमारे घर वाले आज भी रमून से आयी चीजें लोगों को दिखाते हुए गर्व महसूस करते हैं जिनमें दो बड़े ऊंचे ऊंचे पलंग जो साखू की लकड़ी से बने हैं और एक लालटेन एक आरामकुर्सी । अभी भी याद आता है िक जब हम लोग ऊचककर पलंग पर बैठने को होते थे तो बाबाजी जहां रहते वहीं से हड़काते ,,गोड़ पोंछ कै,, । रमून से आने के बाद बाबाजी गोरू बछरू में रम गए । ज्यादा कहीं आते जाते नहीं थे । पेशी वेशी पर फैजाबाद कचेहरी चले जाते थे। खैर बहुत ही अनुशासन पसंद बाबाजी कहानियां भी खूब सुनाते थे। इस बार जब वे दिल्ली से गए तो उनके साथ जाने की ड्यूटी मेरी लग गयी । गांव पहुंचे । सुबह लोग दांतून करते हुए दरवाते पर आने लगे आते ही पूंछते रमूनिहा आय गयो हो का । शाम को जमावड़ा हुआ तो बाबाजी के किस्से खतम होने के नाम ही नहीं ले रहे थे ।बकौल बाबाजी जा राजू हियां कौनो सड़क अहै सड़क अहै तौ दिल्ली कै । महराज गड़िया मा बैठा रहा मजाल जौ पेटे कै पानी हील जाय । अउर दुकान तौ एक से एक । चाहे जवन लेया । घर से निसरतै सब चीजियै क दूकान । लेकिन बच्चा दिल्ली मा केहू के घरे जाय क बाद मा केवल सादा पानियय देय थै । बहुत बुरा लागत थै छूंछ पैलगी जिव झन्न । बाद भले चाय वाय लाय देय लकिन पहले तव चटकनै लागा थय । एक चीज जवन देखन मजा आय गय । मुझको संबोधित करते हुए हे बब्बू तू बतावा जवन हमय लैकय गय रह्या लोटवा गिनय वाली मशीनियां मा,हम बढिया से ना बताय पाउब । हम कहेन बतावा बाबा तोहरे बताये से ज्यादा मजा आए । बाबा शुरू हो गये । बब्बुआ हमय मोटरसाइकिली पै बैठाय कै लय गय । एक ठी छोट भरे कै कमरा रहा हो । वही मय एक मशीन लाग रही मशीनियां मा कुछ चौखिन्टा कै एक ठी चीज डरिस बस भइया खरखर खरखर पांच पांच सौ नोटिया गिरै लाग । सारे गांव वासी एक अच्छे श्रोता की तरह मंतर मुग्ध होकर सुन रहे थे । मैं सोच रहा था कि केवल मेरे बाबाजी ही नहीं अभी पूरे गांव वालों को बहुत कुछ जानना समझना है।
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