Tuesday, January 29, 2008

टमाटर जनित दर्द


आज सुबह रोज कि तरह अखबार बाचने बैठा तो एक अलग तरह कि अनुभूति हुई जिसको आप सबसे शेयर करने का मन कर रहा है।होता यह है कि आफिस मे जयादा जानकार दिखने के लिए मैं सुबह अखबार बहुत ही करीने से बांचता हूँ । आज भी इसी क्रम के दौरान नाश्ता भी आ गया । मेरा कन्सेंन्टेरेसन खबरों मे हो चूका था । अचानक चटनी के साथ परांठे खाते समय मुझे किसी चीज कि कमी महसूस हुई । मैंने वहीं से ग़ैर तवज्जो दिए आवाज लगाई अरे चटनी में टमाटर कम पड़ा है धनियाहीन आ रही है । अंदर से ही उत्तर सुनायी पड़ा । बीस रुपया किलो से कम ही नही हो रह है । रोज एक किलो आता है सुबह साम मे ख़त्म । इतने दाम मे तो डेढ़ किलो सेब मिल जाता है । आप कहते है न कि जीवन का मज़ा खट्टे में ही है । जनाब अब खट्टापन महंगा हो गया है। मेरा ध्यान ख़बरों से उचाट चूका था । मन पुरा खट्टा हो चूका था । टमाटर से जुडी खुच पुरानी यादे मस्तिस्क मे हथोड़ा से वार कर रहीं थी ।

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