अक्सर जब होता हूं उदास
बैठता हूं लिखने को कविता
पेंसिल से कागज पर
केवल खींचता हूं लकीरें
लोग यह न कहें कि
यार तुम तो बन गए हो
लकीर के फकीर
इससे बचने के लिए
पहले खीचीं गयी रेखाओं
को आड़ी रेखाएं खींचकर काटता हूं
लेकिन यह क्या
बरबस बन जाता है एक अक्स
धुंधला सा नजर आता है एक चेहरा
अतीत में हो जाता हूं गुम
और हो जाता हूं
और उदास,और उदास बहुत उदास
Tuesday, July 29, 2008
Sunday, April 6, 2008
आर्थिक बूम यही है का
सबसे पहले तो पिछले कुछ दिनों से गायब रहने के लिए माफी चाहूंगा । दरअसल जिंदगी की भाग दौड़ में
मन कब किस चीज से विरक्त हो जाए और कब किस पर आसक्त हो जाए,समझना टेढ़ी खीर है । खैर जब अब आ ही गए है तो सबको नमस्कार ठोंकना चाहूंगा ।
आज अखबार बांचते समय ध्यान गया एक खबर पर । दिल्ली ने जनसंख्या के हिसाब से मुंबई का रिकार्ड तोड़ दिया है । एक संस्था द्वारा किए गए अध्ययन में दिल्ली की आबादी २.२ करोड़ से ज्यादा है वहीं मुंबई की आबादी १.९४ करोड़ है ।
इसमें कोई संदेह की गुंजाइश नहीं है कि मुंबई अब भी सबसे ज्यादा भीड़ भाड़ वाला शहर है । यहां जनसंख्या घनत्व अब भी दिल्ली से कई गुना ज्यादा है।
खैर बात दिल्ली की हो रही थी। यहां की मुख्यमंत्री शीला दीछित पिछले नौ सालों से कुरसी पर विराजमान है । अपने बयानों से विवाद खड़े करना इनको शायद अच्छा लगता है। पिछले दिनों ब्लूलाइन से सडक दुर्घटनाओं पर बयान दिया कि इसके पीछे पैदल यात्री जिम्मेदार हैं । ये लोग संभलकर नहीं चलते । खूब हो हल्ला हुआ । बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश करने की दलीलें दी गयी। मामला आया गया हो गया ।
अभी कल के अखबार में महंगाई पर इनका एक और बयान छपा है । बयान में इन्होंने कहा कि महंगाई इसिलए है क्योंकि इकोनामी बूम कर रही है । लोगों के पास पैसा आ रहा है लोग चीजें ज्यादा खरीद रहें है । इसलिए वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे है।
अच्छा चलिए, मान लेते हैं कि लोगों के पास पैसा खूब आ रहा है तो कितना आलू टमाटर भिंडी गोभी खरीद कर डंप करोगे या दाल चावल तेल अनाज खाने की चीजें आदमी जरुरत भर का ही खरीदेगा । या साल भर का इकट्ठा भंडारण कर लेगा ।
माननीय मुख्यमंत्री जी को यह बात समझना चाहिए ।
दूसरी बात यह कि अगर मुद्रास्फीति बढ़ने और अर्थव्यवस्था के बूम में कोई सीधा संबंध होता तो जिंबाबे की अर्थव्यवस्था की विकास दर सब देशों से तेज होती । वहां मुद्रास्फीति १ लाख फीसदी से ज्यादा है । एक जून का भोजन करीब १.५ लाख डालर का पड़ रहा है । अब श्रीमती दीछित जी क्या बताएंगी कि जिंबाबे की विकास दर कितनी तेज है ।
सोचिए सात फीसदी मुद्रास्फीति में हमारे यहां आलम ये है तो वहां क्या होगा । सब्जी खरीदने जाओ तो दुकानदार पाव में भाव बताता है । सब्जी वाला हमारी हैसियत से वाकिफ होता है । उसको पता है कि फलां मद में भाई साहब एक निश्चित रकम ही खरचेंगे । जमीनी हकीकत यह है और बयानबाजी ये हो रही है कि लोग खूब खरीद रहे है जिससे महंगाई बढ़ रही है ।
एक किस्सा बताना चाहूंगा हमारे यहां गांव में कहावत है कि प्रायमरी के अध्यापक टमाटर कटवाकर खरीदते है । इसके पीछे की जो कहानी है वह इस प्रकार है ।
एक मास्टर साहब बाजार गए सब्जी खरीदने । ताजे बड़े-बड़े टमाटर देख कर अपने आपको रोक न सके।
कौतुक बस पूछ ही लिया दुकानदार से क्या रेट है भाई टमाटर,मास्टरजी मुहल्ले के सम्मानित व्यक्ति थे सो विनम्रता के साथ दुकानदार बोला माटसाब २० रु किलो । मास्टर साहब ने कहा बड़े महंगे लगा रखे हो यार । जबाब मिला क्या करें माटसाब मंडी से ही यही हाल है । ऊपर से किराया मार डाल रहा है ।
खैर चूंकि माटसाब दाम पूंछ ही चुके थे तो इज्जत बचाने के लिए लेना ही पड़ता । इसलिए बोले कि अच्छा ठीक है १०० ग्राम दे दो । अब दुकानदार के सारे टमाटर बड़े बड़े । कोई सौ ग्राम का नहीं सब ऊपर । हारकर उसने कहा माटसाब काट कर टमाटर नहीं बेंचता हूं ।
आश्चर्य न करें तब प्रायमरी के अध्यापक की तनख्वाह आज की तरह नहीं थी । तब ५०० रुपये में मन लगाकर पढ़ाते थे और अपने परिवार का भरण पोषण करते थे । अब हालत ये है कि ज्यादा तनख्वाह में भी पढ़ाने में मन नहीं लगता ।
मन कब किस चीज से विरक्त हो जाए और कब किस पर आसक्त हो जाए,समझना टेढ़ी खीर है । खैर जब अब आ ही गए है तो सबको नमस्कार ठोंकना चाहूंगा ।
आज अखबार बांचते समय ध्यान गया एक खबर पर । दिल्ली ने जनसंख्या के हिसाब से मुंबई का रिकार्ड तोड़ दिया है । एक संस्था द्वारा किए गए अध्ययन में दिल्ली की आबादी २.२ करोड़ से ज्यादा है वहीं मुंबई की आबादी १.९४ करोड़ है ।
इसमें कोई संदेह की गुंजाइश नहीं है कि मुंबई अब भी सबसे ज्यादा भीड़ भाड़ वाला शहर है । यहां जनसंख्या घनत्व अब भी दिल्ली से कई गुना ज्यादा है।
खैर बात दिल्ली की हो रही थी। यहां की मुख्यमंत्री शीला दीछित पिछले नौ सालों से कुरसी पर विराजमान है । अपने बयानों से विवाद खड़े करना इनको शायद अच्छा लगता है। पिछले दिनों ब्लूलाइन से सडक दुर्घटनाओं पर बयान दिया कि इसके पीछे पैदल यात्री जिम्मेदार हैं । ये लोग संभलकर नहीं चलते । खूब हो हल्ला हुआ । बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश करने की दलीलें दी गयी। मामला आया गया हो गया ।
अभी कल के अखबार में महंगाई पर इनका एक और बयान छपा है । बयान में इन्होंने कहा कि महंगाई इसिलए है क्योंकि इकोनामी बूम कर रही है । लोगों के पास पैसा आ रहा है लोग चीजें ज्यादा खरीद रहें है । इसलिए वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे है।
अच्छा चलिए, मान लेते हैं कि लोगों के पास पैसा खूब आ रहा है तो कितना आलू टमाटर भिंडी गोभी खरीद कर डंप करोगे या दाल चावल तेल अनाज खाने की चीजें आदमी जरुरत भर का ही खरीदेगा । या साल भर का इकट्ठा भंडारण कर लेगा ।
माननीय मुख्यमंत्री जी को यह बात समझना चाहिए ।
दूसरी बात यह कि अगर मुद्रास्फीति बढ़ने और अर्थव्यवस्था के बूम में कोई सीधा संबंध होता तो जिंबाबे की अर्थव्यवस्था की विकास दर सब देशों से तेज होती । वहां मुद्रास्फीति १ लाख फीसदी से ज्यादा है । एक जून का भोजन करीब १.५ लाख डालर का पड़ रहा है । अब श्रीमती दीछित जी क्या बताएंगी कि जिंबाबे की विकास दर कितनी तेज है ।
सोचिए सात फीसदी मुद्रास्फीति में हमारे यहां आलम ये है तो वहां क्या होगा । सब्जी खरीदने जाओ तो दुकानदार पाव में भाव बताता है । सब्जी वाला हमारी हैसियत से वाकिफ होता है । उसको पता है कि फलां मद में भाई साहब एक निश्चित रकम ही खरचेंगे । जमीनी हकीकत यह है और बयानबाजी ये हो रही है कि लोग खूब खरीद रहे है जिससे महंगाई बढ़ रही है ।
एक किस्सा बताना चाहूंगा हमारे यहां गांव में कहावत है कि प्रायमरी के अध्यापक टमाटर कटवाकर खरीदते है । इसके पीछे की जो कहानी है वह इस प्रकार है ।
एक मास्टर साहब बाजार गए सब्जी खरीदने । ताजे बड़े-बड़े टमाटर देख कर अपने आपको रोक न सके।
कौतुक बस पूछ ही लिया दुकानदार से क्या रेट है भाई टमाटर,मास्टरजी मुहल्ले के सम्मानित व्यक्ति थे सो विनम्रता के साथ दुकानदार बोला माटसाब २० रु किलो । मास्टर साहब ने कहा बड़े महंगे लगा रखे हो यार । जबाब मिला क्या करें माटसाब मंडी से ही यही हाल है । ऊपर से किराया मार डाल रहा है ।
खैर चूंकि माटसाब दाम पूंछ ही चुके थे तो इज्जत बचाने के लिए लेना ही पड़ता । इसलिए बोले कि अच्छा ठीक है १०० ग्राम दे दो । अब दुकानदार के सारे टमाटर बड़े बड़े । कोई सौ ग्राम का नहीं सब ऊपर । हारकर उसने कहा माटसाब काट कर टमाटर नहीं बेंचता हूं ।
आश्चर्य न करें तब प्रायमरी के अध्यापक की तनख्वाह आज की तरह नहीं थी । तब ५०० रुपये में मन लगाकर पढ़ाते थे और अपने परिवार का भरण पोषण करते थे । अब हालत ये है कि ज्यादा तनख्वाह में भी पढ़ाने में मन नहीं लगता ।
Monday, March 3, 2008
अथ श्री सत्यनारायण प्रथमोध्याय समाप्तः
जीवन में क्या क्या करना पड़ जाए,कुछ कहा नहीं जा सकता है । ऐसा ही कुछ एक बार मुझे करना पड़ा । मैं बीएससी द्वितीय वर्ष का छात्र था । शनिवार की शाम को हम लोग घर चले जाया करते थे । संयोग से एक बार अगले दिन रविवार को पुन्ववासी (पूर्णमासी)पड़ रही थी । लग्न नछत्र एवं मुहुर्त का कुछ ऐसा घालमेल था कि उस दिन सत्यनारायण भगवान की कथा एवं पूजा कराने वालों की इफरात थी । पंडित ढूंढे नहीं मिल रहे थे । हमारे गांव में एक पंडित जी निर्वसिया (अकेले,शादी नहीं की थी) थे । खुद को तो कुछ आता जाता नहीं था लेकिन जजमानी (पुरोहिताई) पूरे इलाके में फैला रखी थी । ठेके पर पंडितों से काम करवाते थे । आज की भाषा में बोलें तो पुरोहिताई की आउटसोर्सिंग करते थे । हमारे इलाके में नए पंडितों की खेप तैयार करने का पूरा श्रेय उन्हीं को जाता है । एक चीज जो और खाश थी उनके बारे में वो था उनका नाम । पूरे इलाके में चिरकुट पंडित के नाम से सन्नाम थे ।तो भइया उस पुन्ववासी के दिन इनके पास भी पंडितों का अकाल पड़ गया । परेशान से हमारे मोहारे (दरवाजे)के पास से गुजर रहे थे । मैने प्रणाम किया तो आशीष के साथ पूछे कब आया हो ?बाबा कलहियां शमवा कय । अच्छा भय राजू पंडित नाय मिलत अहैं । कथा कहय का रहा। ससुर बड़ी लड़जरन बा । हमारे बाबाजी को संबोधित करते हुए,अरे भैयवा येही लड़कवा का भेज देत्या करौनी एक ठी कथा कहय का रहा । बाबा ने कहा अरे ऊ जाबय न करे । ऊ आज कय लवन्डा आय,कथा वथा थोड़य कहे । वही से पूछ ल्या जाय तौ लय जा । बाबाजी ने उनको मेरी इच्छा जानने के लिए कहा । बुजुर्गो के प्रति असीम श्रद्धा भाव हमारी कमजोरी बन गया । इनकार न कर सके लेकिन फिर भी आशंका व्यक्त की, अरे पंडित जी हम कब्भऊ (कभी नहीं) कथा नाय कहे हई । पंडित जी ने कहा बेटा इतना ऊंचे दरजा में पढ़त हया अऊर किताबें मा लिखा न पढ़ पउब्या । हमने उत्तर दिया ऐसी बात नहीं है पंडित जी किताब में जो लिखा होगा उसको तो पढ़ ही लूंगा लेकिन जो अन्य चीजें करनी होती है जैसे फूल रखने,अछत रखने और टीका लगाने,आरती के समय,गोदान,या हवन के समय जो श्लोक पढ़े जाते हैं वो सब मैं थोड़े ही जानता हूं । और वो सब किताब में भी नहीं लिखे रहते । पंडित जी ने भरोसा दिलाते हुए कहा बेटवा वोकर चिंता तू न करा । हम का करय चलत हई । ऊ सब हम करवाय देब । खैर हम नही धोकर धोती तो नहीं पहनी पैंट शर्ट पहनकर चल दिए । दरवाजे पर पहुंचे तो पंडित जी ने कहा कि सब तैयार हय क्या । जजमान ने हाथ जोड़कर कहा हां पंडित जी बस आप चलय बेदी पर । सब इंतजार कर रहें हय । पंडित जी मुझको लेकर बेदी पर पहुंचे और कहा आपको कथा नए पंडित जी सुनाएंगे । सबकी नजरें हमारी तरफ । चेहरे पर आश्चयॆ और उपेछा का भाव । मैं सहसा डर गया । पंडित जी भी भांप गए ,सबको बोले ऐसे मत देखो बहुत ऊंचे दरजे में पढ़ रहा है । खैर कथा शुरू हुई । तमाम कर्मकांड पहले करने पड़ते हैं मैने इशारे से पंडित जी को कहा लेकिन वो जैसे मेरी तरफ ध्यान ही नहीं दे रहे थे । बहुत दुख हुआ सोचा कि आज तो बड़ी बेइज्जती हो जाएगी मार ऊपर से पड़ेगी । फिर मैंने कछा ६ से लेकर ८ तक संस्कृत परिचायिका के जितने श्लोक कंठस्थ किए थे बारी बारी से सबको अजमाया और सबका प्रयोग किया । गनीमत यही रही कि जहां कथा हो रही थी वह परिवार कम पढ़ा लिखा था और श्रद्धालु जो आए थे सुनने वो भी शायद संस्कृत में टाइट थे वरना पंडित जी के साथ हमारी भी कुटाई हो जाती । एक बार तो नाईन ने टोक भी दिया था । हुआ ये कि जब मैं श्लोक पढ़ता तो कोई लंबा श्लोक बिना पूरा किए नहीं रूकता था । बगल में बैठे पंडित जी मुझे हुरिया (कोहनी मार) देते थे । आशय यह होता था कि अब बस करो । नाईन जिसे आधा पंडित माना जाता है उसने पंडित को टोका,पंडित जी आप छोटकऊ पंडी जी को पूरी मंतर पढ़ने से मना क्यों करते हों ।खैर सब अच्छा हुआ । लेकिन यह अनुभव हमेशा एक नया रोमांच देता है ।हां कथा के दौरान मंत्र के रुप में मैने एक श्लोक यह भी पढ़ा था जो शायद संस्कृत परिचायिका कछा ६ की किताब से उद्धृत था ।
चलंतु वीर सैनिकः,पर्यान्तु वीर सैनिकःसगौरवं साडिम डिम व्रजन्तु वीर सैनिकः
ये पंक्तिया नेताजी सुभाष चंद्र वोस अपनी सेना के सैनिको को आगे बढ़ने के लिए उत्साहित करने में करते हैं।
कैसी रही, जरूर लिखें ।
चलंतु वीर सैनिकः,पर्यान्तु वीर सैनिकःसगौरवं साडिम डिम व्रजन्तु वीर सैनिकः
ये पंक्तिया नेताजी सुभाष चंद्र वोस अपनी सेना के सैनिको को आगे बढ़ने के लिए उत्साहित करने में करते हैं।
कैसी रही, जरूर लिखें ।
Sunday, March 2, 2008
डिप्टी साहब का आतंक
देश का बजट चिदंबरम साहब ने पेश कर दिया है । खुशी मनाने वालों की तादाद ज्यादा है जबकि गमगीन तबका बहुत छोटा है । जो भी हो हम बजट की मीनाकुमारी नहीं करने जा रहे हैं । हर साल बजट आता है और आम जनता इसे एक नियति मान कर स्वीकार करती है । या आप लोग बताओ कि किसी बजट आने के बाद फलां चीज खरीदनी बंद कर दी या किसी आदत पर महंगी होने के कारण कंट्रोल कर लिया हो । नही न । तो फिर काहे की किलकिल । हो गया यार जो हो गया । टेँशन लेने का नहीं देने का । सभी के गाड़ी,फ्रिज.टेलीविजन,रोजमर्रा की चीजों पर विराम थोड़े लगेगा । महंगी हो या सस्ती । फर्क पड़ता है लेकिन होनी को कौन टाल सकता है ।
खैर इस बहस में पड़ने की बजाय कुछ काम की बातें कर ली जाए । यह सब नेताओं के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए । इस बजट में क्या लगभग सभी बजट में सरकार का शिछा छेत्र में खर्च की परिपाटी जीडीपी का लगभग ३ फीसदी से थोड़ा सा ज्यादा है । इससे ज्यादा तो चीन,कोरिया एवं ताईवान जैसे देश कर रहे हैं । इन देशों का एजुकेशन सेक्टर पर खर्च जीडीपी का पांच फीसदी से अधिक है किसी का सात फीसदी से भी ज्यादा है । भारत सरकार इससे थोड़ा ही कम गोला बारूद खरीदने यानि रछा छेत्र में करती है । तो आप ही बताइये हमारे भावी कर्णधार पढ़ लिखकर गण तंत्र चलाएगे या गनतंत्र संभालेंगे । इसके बानगी एक वाकया पेश करना चाहूंगा । इजाजत है । शुक्रिया आप लोगों की इजाजत का ।
हां तो भइया अगर आप भी गांव गुरबे के किसी परायमरी (प्राइमरी) स्कूल के प्रोडक्ट होकर और आज कान्वेंट के लड़कों से मोहड़ा (मोर्चा)ले रहे है तो आप समझ गए होंगे पऱायमरी स्कूलों में डिप्टी साहब का आतंक । होता क्या है कि महीने चार महीने में इन स्कूलों में मानीटरिंग के लिए डिप्टी साहब दौरे पर आते हैं । लचर पढ़ाई और कुव्यवस्था होने के कारण इन स्कूलों के अध्यापकों में डर साफ झलकता है । सभी बच्चों को एक दिन पहले ही चेताया जाता है कि कल डिप्टी साहब आने वाले हैं साफ सुथरे कपड़े पहन कर आना । गदहा पार्टी छुट्टी भी कर सकती है । इतने भयभीत रहते थे अध्यापक की बच्चे भी उनके इस डर को भांप जाते थे । परिणामस्वरूप बच्चों में अध्यापकों से कई गुना डिप्टी साहब का खौफ घर कर जाता था । इसे आप अध्यापकों की अग्यानता ही कहेंगे कि डिप्टी साहब के बारे में सही जानकारी बच्चों को नहीं दी जाती थी ।
लेकिन डिप्टी साहब के औचक निरीछण के दौरान अध्यापकों की फूंक सरक जाती थी । अप्रत्याशित दौरे से तैयारी का समय नहीं मिल पाता था । जो जैसा है उसी हाल में डिप्टी साहब सबसे मिलते थे । एक एक क्लास में विजिट करते हुए एक बार इसी तरह के औचक निरीछण के दौरान डिप्टी साहब कछा पांच में पहुंचे । परायमरी में कछा पांच सबसे बड़ी क्लास होती थी और उसे डायरेक्ट हेडमास्टर डील करते थे । हेडमास्टर साहब पढ़ा रहे थे । डिप्टी साहब के पहुंचने पर सब शांत हो गए । डिप्टी साहब ने पूंछा मास्टर साहब क्या पढ़ा रहे हो बच्चों को । उत्तर मिला हिंदी । बच्चों के आई क्यू टेस्ट के लिए डिप्टी साहब ने पूंछा बच्चों पर्यायवाची क्या होता है? कोई उत्तर नहीं आया? डिप्टी साहब ने क्लिष्ठ प्रश्न को थोड़ा और आसान करते हुए पूछा बच्चों बताओ कोई एक ही चीज हो और उसके नाम अलग अलग हों । कछा में मौत सा सन्नाटा । कोने से एक हाथ ऊपर उठा । ये हाथ था भुनगू शर्मा का । भुनगू के बारे में बताते चलें कि कछा में सबसे गदहा लड़का था । कुछ भेजे में घुसता ही नही था,अव्वल तो भेजा था ही नहीं । हेडमास्टर साहब के दिल की धड़कने १८० की रफ्तार में । सोच रहे थे सब गुड़ गोबर हो गया । क्लास का सबसे तेज लड़का क्यों नही हाथ खड़े कर रहा है । मन को सांत्वना भी दे रहे हैं शायद डर रहा है। खैर डिप्टी साहब के पीछे से हाथ से इशारा करके भुनगू को मना करने का हेडमास्टर का असफल प्रयास ताड़ गए डिप्टी साहब । हेडमास्टर को डांटते हुए बोले, बोलने दो बोलने दो, जब बच्चा बताने जा रहा है तो आप मना क्यों कर रहें हैं । भुनगू खड़े हुए बोले, गुरूजी बताई । डिप्टी साहब ने पुचकारते हुए कहा हां,बेटा बताओ । गुरूजी बार (बाल या हेयर)। डिप्टी साहब ने पूंछा ,कैसे ।
भुनगू लगे व्याख्या करने । हाथ उठाकर अपने सिर पर रखते हुए भुनगू बोले, गुरूजी मूढे कय बार (सिर का बाल),बरौनी, मूंछ,दाढ़ी अऊर गुरूजी सीना कय बार अऊर गुरूजी.....
हेडमास्टर साहब बड़ी तत्परता दिखाते हुए उसकी बात को बीच में ही काटते हुए चिल्लाए, बस भुनगू बस, अब और नीचे नहीं जाना । डिप्टी साहब भी भुनगू की इस सरलता पर मन ही मन मुस्कराए बिना नहीं रह सके।
तो जनाब यह है हमारी प्राथमिक शिछा तंत्र का हाल । जब मास्टर ही अवेयर नहीं है तो छात्र तो बेचारे छात्र ही हैं।
कैसी रही जरूर लिखे ।
खैर इस बहस में पड़ने की बजाय कुछ काम की बातें कर ली जाए । यह सब नेताओं के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए । इस बजट में क्या लगभग सभी बजट में सरकार का शिछा छेत्र में खर्च की परिपाटी जीडीपी का लगभग ३ फीसदी से थोड़ा सा ज्यादा है । इससे ज्यादा तो चीन,कोरिया एवं ताईवान जैसे देश कर रहे हैं । इन देशों का एजुकेशन सेक्टर पर खर्च जीडीपी का पांच फीसदी से अधिक है किसी का सात फीसदी से भी ज्यादा है । भारत सरकार इससे थोड़ा ही कम गोला बारूद खरीदने यानि रछा छेत्र में करती है । तो आप ही बताइये हमारे भावी कर्णधार पढ़ लिखकर गण तंत्र चलाएगे या गनतंत्र संभालेंगे । इसके बानगी एक वाकया पेश करना चाहूंगा । इजाजत है । शुक्रिया आप लोगों की इजाजत का ।
हां तो भइया अगर आप भी गांव गुरबे के किसी परायमरी (प्राइमरी) स्कूल के प्रोडक्ट होकर और आज कान्वेंट के लड़कों से मोहड़ा (मोर्चा)ले रहे है तो आप समझ गए होंगे पऱायमरी स्कूलों में डिप्टी साहब का आतंक । होता क्या है कि महीने चार महीने में इन स्कूलों में मानीटरिंग के लिए डिप्टी साहब दौरे पर आते हैं । लचर पढ़ाई और कुव्यवस्था होने के कारण इन स्कूलों के अध्यापकों में डर साफ झलकता है । सभी बच्चों को एक दिन पहले ही चेताया जाता है कि कल डिप्टी साहब आने वाले हैं साफ सुथरे कपड़े पहन कर आना । गदहा पार्टी छुट्टी भी कर सकती है । इतने भयभीत रहते थे अध्यापक की बच्चे भी उनके इस डर को भांप जाते थे । परिणामस्वरूप बच्चों में अध्यापकों से कई गुना डिप्टी साहब का खौफ घर कर जाता था । इसे आप अध्यापकों की अग्यानता ही कहेंगे कि डिप्टी साहब के बारे में सही जानकारी बच्चों को नहीं दी जाती थी ।
लेकिन डिप्टी साहब के औचक निरीछण के दौरान अध्यापकों की फूंक सरक जाती थी । अप्रत्याशित दौरे से तैयारी का समय नहीं मिल पाता था । जो जैसा है उसी हाल में डिप्टी साहब सबसे मिलते थे । एक एक क्लास में विजिट करते हुए एक बार इसी तरह के औचक निरीछण के दौरान डिप्टी साहब कछा पांच में पहुंचे । परायमरी में कछा पांच सबसे बड़ी क्लास होती थी और उसे डायरेक्ट हेडमास्टर डील करते थे । हेडमास्टर साहब पढ़ा रहे थे । डिप्टी साहब के पहुंचने पर सब शांत हो गए । डिप्टी साहब ने पूंछा मास्टर साहब क्या पढ़ा रहे हो बच्चों को । उत्तर मिला हिंदी । बच्चों के आई क्यू टेस्ट के लिए डिप्टी साहब ने पूंछा बच्चों पर्यायवाची क्या होता है? कोई उत्तर नहीं आया? डिप्टी साहब ने क्लिष्ठ प्रश्न को थोड़ा और आसान करते हुए पूछा बच्चों बताओ कोई एक ही चीज हो और उसके नाम अलग अलग हों । कछा में मौत सा सन्नाटा । कोने से एक हाथ ऊपर उठा । ये हाथ था भुनगू शर्मा का । भुनगू के बारे में बताते चलें कि कछा में सबसे गदहा लड़का था । कुछ भेजे में घुसता ही नही था,अव्वल तो भेजा था ही नहीं । हेडमास्टर साहब के दिल की धड़कने १८० की रफ्तार में । सोच रहे थे सब गुड़ गोबर हो गया । क्लास का सबसे तेज लड़का क्यों नही हाथ खड़े कर रहा है । मन को सांत्वना भी दे रहे हैं शायद डर रहा है। खैर डिप्टी साहब के पीछे से हाथ से इशारा करके भुनगू को मना करने का हेडमास्टर का असफल प्रयास ताड़ गए डिप्टी साहब । हेडमास्टर को डांटते हुए बोले, बोलने दो बोलने दो, जब बच्चा बताने जा रहा है तो आप मना क्यों कर रहें हैं । भुनगू खड़े हुए बोले, गुरूजी बताई । डिप्टी साहब ने पुचकारते हुए कहा हां,बेटा बताओ । गुरूजी बार (बाल या हेयर)। डिप्टी साहब ने पूंछा ,कैसे ।
भुनगू लगे व्याख्या करने । हाथ उठाकर अपने सिर पर रखते हुए भुनगू बोले, गुरूजी मूढे कय बार (सिर का बाल),बरौनी, मूंछ,दाढ़ी अऊर गुरूजी सीना कय बार अऊर गुरूजी.....
हेडमास्टर साहब बड़ी तत्परता दिखाते हुए उसकी बात को बीच में ही काटते हुए चिल्लाए, बस भुनगू बस, अब और नीचे नहीं जाना । डिप्टी साहब भी भुनगू की इस सरलता पर मन ही मन मुस्कराए बिना नहीं रह सके।
तो जनाब यह है हमारी प्राथमिक शिछा तंत्र का हाल । जब मास्टर ही अवेयर नहीं है तो छात्र तो बेचारे छात्र ही हैं।
कैसी रही जरूर लिखे ।
Monday, February 25, 2008
देवलोक में भी खटमलों का प्रकोप
देवलोक में भी खटमलों का प्रकोप गर्मियां शुरू होने को हैं । मच्छरों एवं खटमलों के सक्रिय होने का समय आ रहा है । पूर्व में आए तमाम सर्वेछणों में बताया गया है कि तनाव या फलाने चीज के कारण नींद नहीं आ रही है लोगों को । एक तो करेला उस पर नीम चढा । अब ये आथ्रोपोडा संघ के राछस जीना हराम कर देंगे । टीवी पर एक से एक कीटनाशकों का प्रचार आता है लेकिन ये कीटनाशक इनके लिए टानिक का काम कर रहे हैं । इनकी प्रतिरछा प्रणाली कीटनाशक चाट चाट कर इतनी सुदृढ़ हो गयी है कि अब कीटनाशक इनके लिए इत्र हो गये हैं । इत्र लगाकर ये अपने काम को ज्यादा प्रभावी ढंग से अंजाम दे रहे हैं ।अब क्या किया जाय क्या तोड़ हो सकता है इन राछसों का । कैसे नींद पूरी करें । बगैर नींद पूरी किए हर छेत्र में आपका प्रदर्शन गड़बड़ा जाएगा । इस तरह से देश की पूरी वर्कफोर्स ही ढह जाएगी । आईटी और बीपीओ जिसके दम पर भारत महाशक्ति बनने का दंभ भरता है,इनके कर्मचारियों का तो रात भर जागरण और दिनभर आ-मरण हो जाएगा । खैर मैं बड़ा चिंतित हुआ । गहन सोच में डूब गया । सोचा कि यार ये अपने देवता लोग तो चारपाई पर सोते ही नहीं हैं । इस संदर्भ में कभी पढ़ा हुआ एक श्लोक याद आयाश्लोक कुछ इस प्रकार था
कमले कमला शेते, हरः शेते हिमालयः ।
छीराब्धौ च विष्णु शेते,मन्ये मत्कुढ़ शंकया ।।
देवियों और सज्जनों भावार्थ यह है कि कमल के पुष्प पर लछ्मी जी निवास करती है । देवादिदेव महादेव भगवान शिव जैसे देवता भी हिमालय पर्वत पर स्थान बनाए हुए है । वहीं तीनों लोकों के मालिक विष्णु भगवान छीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर नींद का परमसुख भोगते है । क्या कारण है ये लोग चारपाई का उपयोग नहीं करते है कहीं इसके पीछे खटमलों का भय तो नहीं है?
किसी ने ठीक कहा है कि न सोने जैसा सुख,न रोने जैसा दुख । इस भवसागर रूपी पृथ्वी पर भी सबसे बड़ा सुख अच्छी नींद लेना है । जैसा कि आपने देखा कि देवलोक में भी इस सबसे बड़े सुख को अर्जित करने के लिए हमारे धुरंधर देवता भी चारपाई का प्रयोग नहीं कर रहे हैं ।इसलिए हे प्राणी हमें भी इस सुख को हासिल करने के लिए कुछ विकल्पों पर सोचना होगा ।
कमले कमला शेते, हरः शेते हिमालयः ।
छीराब्धौ च विष्णु शेते,मन्ये मत्कुढ़ शंकया ।।
देवियों और सज्जनों भावार्थ यह है कि कमल के पुष्प पर लछ्मी जी निवास करती है । देवादिदेव महादेव भगवान शिव जैसे देवता भी हिमालय पर्वत पर स्थान बनाए हुए है । वहीं तीनों लोकों के मालिक विष्णु भगवान छीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर नींद का परमसुख भोगते है । क्या कारण है ये लोग चारपाई का उपयोग नहीं करते है कहीं इसके पीछे खटमलों का भय तो नहीं है?
किसी ने ठीक कहा है कि न सोने जैसा सुख,न रोने जैसा दुख । इस भवसागर रूपी पृथ्वी पर भी सबसे बड़ा सुख अच्छी नींद लेना है । जैसा कि आपने देखा कि देवलोक में भी इस सबसे बड़े सुख को अर्जित करने के लिए हमारे धुरंधर देवता भी चारपाई का प्रयोग नहीं कर रहे हैं ।इसलिए हे प्राणी हमें भी इस सुख को हासिल करने के लिए कुछ विकल्पों पर सोचना होगा ।
Sunday, February 24, 2008
गधा ,चितर देखता है?
कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन । बहुत याद आता है बचपन । बात जूनियर हाई स्कूल के दिनों की । स्कूल से घर आते थे हम लोग । बस्ता फेंका अम्मा ने झट से खाना दिया । दुआरे (घर के दरवाजे पर)पर गांव के अन्य हमउम्र लड़के आवाज दे रहे होते थे । जल्दी जल्दी खाना निपटाया । मां का कहना अनसुना कर हाथ पोछतें हुए लड़कों के दल में शामिल हो जाते थे ।कौन सा खेल खेलना है इस पर विचार शुरू होता था । प्रमुख खेलों में झाबर,शुर्र,कब्बडी,गेंद भड़ाक एवं सत्ता मुच्छ । क्रिकेट का चलन भी था लेकिन तब महंगा खेल हुआ करता था । बाबूजी से किसी तरह से कह सुनकर एक बैट मंगवाता तो सभी लोग उसी से खेलते । हालांकि बैट की हिफाजत के लिए नियम कानून बनाए जाते थे । बाजार वाले बैट से केवल रनिंग की जाएगी । गांव के हौसिला बढ़ई द्वारा बनाए गए लकड़ी के बैट से ही स्ट्रोक लगाए जाएंगे । अगर टूट जाता था तो दूसरा बन जाता था । बाग में पेड़ो की कमी नहीं थी । उस बैट से खेलने में एक बड़ी दिक्कत जो आती थी कि उससे बड़े स्ट्रोक नही लग पाते थे । बहुत वजनी होता था । इसलिए हम लोग ढेर(एक विशेष प्रकार का पेड़ जिसकी लकड़ी हल्की व मजबूत मानी जाती है । लेकिन इन पेड़ों की संख्या काफी कम होती है)के तने से बैट बनवाते थे । एक मात्र ढेर का पेड़ केवल हमारे पास था । उसका पेड़ं भी बहुत छोटा होता है तो कुल मिलाकर एक से ज्यादा बैट की बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं होती थी । बाजार वाले बैट का उपयोग हमलोग किसी दूसरे गांव से मैच के दौरान करते थे । यह स्टेटस सिंबल हुआ करता था । खौर दोनों प्रकार के बैट्स की गैरमौजूदगी में हम लोग ऊपर इंगित खेलों से अपना मनोरंजन करते थे । खूब मस्ती धमाचौकड़ी होती थी ।अंधेरा होने से पहले घर आना जरूरी होता था । घर आकर बड़े पिताजी के बाजार से आने से पहले पढ़ने बैठ जाया करते थे । लाइट नहीं है तो लालटेन जलाते थे। उसके शीशे को चूना लगाकर साफ करते थे । यह विधि हमको हमारे छोटे चाचाजी ने बताया था रामधे आप भी करके देखिए शीशा नया हो जाएगा । लालटेन जलाकर बैठे हुए कुछ ही समय बीतता इतने में बड़े पिताजी का बाजार से लौटने का समय नियत रहता था । सीरियस रहने वाले बड़े पिताजी को हम लोग सब डरते थे । किसी को बुलाकर साथ में लाए झोले को पकड़ाते हुए कहते थे बड़ी अम्मा को दे दो । इस झोले में बाजार से लायी तरकारी होती थी । उसके बाद हमलोगों के पढ़ने के स्थान पर आते थे और जिसकी जो जरूरत होती थी उसको कापी,किताब,कलम,ओमेगा स्याही इत्यादि देते थे । स्कूल वाला होमवर्क मैं इसी समय पूरा कर लेता था सुबह का कोई चक्कर नहीं छोड़ता था । सुबह होने पर इत्मीनान से केवल स्कूल जाना ही पसंद करता था । स्कूल में पहला घंटा संस्कृत का होता था । हमारे क्लास में एक सरदार मिश्र पढ़ते थे उम्र कुछ ज्यादा थी लेकिन पढ़ते सांतवी में थे । पढ़ने लिखने में मन नहीं लगता था । एक दिन संस्कृत टीचर कुछ पढ़ा रहे थे तो सरदार मिसिर किताब के पन्ने पलट रहे थे । पन्ने पलटने से शांत माहौल में एक आवाज मास्टर साहब को इरीटेट कर रही थी । मास्टर साहब ने सरदार को खड़ा करके पूंछा क्या कर रहे हो । सरदार ने कहा गुरूजी चित्र देख रहा हूं । मास्टर साहब ने गुस्से में कहा ,गधा चितर देखता है दो डंडे मारने के बाद क्लास से बाहर कर दिया । गुरूजी का यह ऐतिहासिक वाक्य जुमले में बदल गया । उसके बाद सरदार को देखते ही सब लड़के गधा चितर देखता है के जुमले से संबोधित करते थे ।
अगली पोस्ट में- कुछ मजेदार शरारतें
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Saturday, February 23, 2008
खतरे में मानवता

आपने ब्लेड रनर,टर्मिनेटर राइजिंग आफ मशीन श्रृंखला की फिल्में देखी होगी तो याद होगा किस तरह से तकनीकी का विकास मानव अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है ।जनाब ये केवल फिल्मों की बातें नहीं है ये कटु सत्य है । अभी इसी हफ्ते इस आशय की एक खबर आयी। लेकिन इस खबर को बहुत हल्के से लिया गया ।अमेरिका में मानवता के खिलाफ तकनीकी चुनौतियों की पहचान के लिए १८ लोगों का एक दल बनाया गया है। इस दल में छोटे मोटे लोग नहीं है अपने छेत्र के माहिर खिलाड़ी शामिल हैं । इंही १८ लोगों में से एक हैं अमेरिकन कम्प्यूटर गुरू रे कुर्जवील ।कुर्जवील ने अपने बयान में जो बातें कही है वो न केवल चौकाती है बल्कि सोचने पर विवश भी करती हैं ।कुर्जवील के अनुसार मानव दिमागी छमताओं से आगे निकल जाएंगी मशीनें । बींसवी सदी में जितना तकनीकी विकास हुआ उसका ३२ गुना ज्यादा विकास हम केवल इस आधी सदी में हासिल कर लेगें ।मशीनों में मानव जैसे तेज मस्तिष्क को विकसित किया जा सकेगा । आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस द्वारा मशीनें मानव को पछाड़ देगी । अगले दो दशकों में बुढ़ापे और बीमारियों पर रोक ही नहीं बल्कि उन्हे रिवर्स कर प्रभाव उत्तरोत्तर कम किया जा सकेगा । अब सवाल यह उठता है कि विग्यान वरदान है या अभिशाप । मानव सुविधाभोगी होता जा रहा है । आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है के नाम पर खोज पर खोज होती जा रही है । हमारे एक इशारे पर सब कुछ हाजिर होना चाहिए । रिमोट युक्त संचालन चलन में है । सबकुछ झमाझम चाहिए । आखिर इन सबकी परिणति क्या होगी । क्या कभी ऐसा भी वक्त आ सकता है जब मशीनें हमारे ऊपर राज करेंगी । आखिर सोचिए जब कोई ऐसी मशीन विकसित कल ली जाएंगी जो हर छेत्र में मानव से बीस होगी तो क्या होगा ।एक किस्सा याद आता है कि जब बिल्ली ने शेर को सारे गुण बता दिए तो शेर ने बिल्ली को ही खाने का मन बनाया । इरादा भांप कर बिल्ली पेड़ पर चढ़कर अपनी जान बचाती है । इसी तरह मान लेते हैं मानव जब इस तरह की मशीन बनाएगा तो जाहिर सी बात है उसका रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में रखेगा । लेकिन तब स्थिति क्या होगी जब किसी तरीके से रिमोट मशीन के कब्जे में होगा । सोचकर ही भयावह लगता है । संभल जाइये वरना हमारे अस्तित्व को कोई बचा नहीं पाएगा । प्रलय आएगी और सब कुछ खाक हो जाएगा । सृष्टि से खिलावाड़ बहुत महंगा पड़ सकता है ।आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस शब्द को पहली बार १९५६ में कंप्यूटर बैग्यानिक जान मैक्कार्थी ने प्रयोग किया ।एमआईटी के मार्विन मिंक्सी ने १९५० एवं ६० को दशकों में इस कांसेप्ट को फैलाया । साइंस फिक्शन लेखक आर्थर सी क्लार्क ने अपनी पुस्तकों में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस कांसेप्ट का खूब प्रयोग किया ।मानव बनाम मशीन जंग की शुरूआत १९९७ में ही शुरू हो चुकी थी । जब ११ मई १९९७ को विश्व शतरंज चैंपियन गैरी कास्पारोव को आईबीएम के कंप्यूटर डीप ब्लू ने धूल चटा दी थी । यह मानव की मशीन से पहली हार थी । ५ दिसंबर २००६ को एक बार फिर डीप फ्रिज ने विश्व शतरंज चैंपियन ब्लादीमीर क्रैमनिक को पिछाड़ा । जुलाई १९९७ में नासा के सोजोयुनर रोबोट रोबर ने मंगल ग्रह पर जाकर आवश्यक जानकारियां एकत्र की । अक्टूबर १९९८ में नासा ने डीप स्पेस १ आटोनामस स्पेसक्राफ्ट छोड़ा जिसका मकसद वहां जाकर ऐसी तकनीकी का पता लगाना था जिससे आगामी मिशन में केवल रोबोट को भेजा जा सके । इसी साल रेगिस्तान में आयोजित १३१ किमी. लंबी कार रेस में बिना रिहर्सल किए रोबोट कार चालक ने सबको पीछे छोड़ कर रेस अपने नाम की । मानवरहित जासूसी विमान आज देशों की जरूरत बन गए हैं । अप्रैल २००१ में ग्लोबल हाक रोबोटिक स्पाई प्लेन ने १३००० किमी. की उड़ान सकुशल तय की । ये सारे उद्धरण आप सबको डराने के लिए नहीं दे रहा हूं बल्कि ये सोचने पर विवश कर सकते हैं कि हम कहां जा रहे हैं । ग्लोबल वार्मिंग का भय अलग से तारी है । तकनीकी विकास द्वारा मशीनों को गुलाम बनाने वाले हम लोग कब तक सुरछित हैं । कभी न कभी तो ये गुलाम क्रांति करेंगे । आखिर बकरे की मां कब तक खैर मनाएंगी । और इन गुलामों की क्रांति (प्रलय) निश्चित तौर पर सृष्टि की अब तक की सबसे बड़ी क्रांति होगी
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