Saturday, October 23, 2010

पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब…


… और घड़ी की सूइयों ने तीन अक्टूबर के दिन शाम के सात बजा दिए। इसी के साथ १९वें राष्ट्रमंडल खेलों के उद्घाटन समारोह की औपचारिक शुरुआत हो गई। अब तक इन खेलों के बारे में अच्छा और केवल अच्छा बोलने, लिखने और पढ़ने की आदत भी बन चुकी थी। सच भी है, अंत भला तो सब भला। लेकिन अभी इसका समापन ११ दिन दूर है। हालांकि देश का एक सच्चा नागरिक होने के नाते हम सबको इसके सफल समापन की कामना करनी चाहिए। दुनिया में अपनी युवाशक्ति के बूते असाध्य को साध्य में तब्दील करने की माद्दा रखने वाले देश की इस खेल आयोजन ने खूब जगहसाई कराई। किरकरी करने का आलम यह था कि जो देश किसी भी क्षेत्र में हमारा पासंग भी नहीं है वे लोग भी कीचड़ उछालने में सबसे आगे रहे। ताज्जुब तो तब हुआ जब ऐन वक्त पर भी देसी मीडिया उत्साहवर्धक खबरें छापने के बजाय सांप मिलने की सफोटो हतोत्साहित खबरें प्रकाशित करने लगा। (हालांकि इस मामले में मेरे विचार गलत हो सकते हैं और इसमें व्यापक बहस की पूरी-पूरी गुंजायश है)। कई जगह तो नियिमत कालम तक शुरू हो चुके थे। विदेशी यहां आकर फेक स्टिंग आपरेशन कर हमारी ही धज्जियां उधेड़ने में लग चुके थे। लेकिन अब जब सफल शुरुआत हो चुकी है तो देश के अब तक के सबसे बड़े इस खेल आयोजन को सफलता के अंतिम मुकाम तक पहुंचाने की दिशा में प्रयास हर भारतवासी का प्रथम कर्तव्य बन जाता है। हम इतनी जगहसाई के पात्र बने, क्यों बने????????? कभी किसी ने सोचने समझने की शायद ही जहमत उठाई हो। प्रथमदृष्टया तो यही लगता है कि जब अपने माल में ही खोट है तो गैरों को क्या दोष दें, लेकिन बात यही खत्म नहीं होती मेरे दोस्त।

दरअसल इन राष्ट्रमंडल खेलों में अकूत धन झोंकने के बाद भी इस अंजाम के लिए किसी को दोषी मानना उचित नहीं लगता है। खेल की तैयारियों में साजिशन देरी करने और भ्रष्टाचार जैसे मामलों में संलिप्त रहे लोगों को सजा निश्चित तौर पर मिले, इसमें किसी को गिला-शिकवा नहीं होना चाहिए, लेकिन इन तब अल्पकालिक निदानों के साथ इस समस्या की जड़ का गहराई से अवलोकन किया जाना चाहिए।

दरअसल हमारे यहां खेल संस्कृति का ही परम अभाव है। जो अधिकारी इन खेलों की देखरेख कर रहे हैं उनके खून में ही नहीं है खेल। वे भी हम लोगों की तरह बचपन में खेलने के लिए मार खाए होंगे। इसीलिए तो राष्ट्रमंडल खेलों को इतनी सीरियसली नहीं लिया जा रहा है। कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक सबकी यही सोच हो गई है कि अरे यार हो जाएगा न। इस सोच के पीछे अनेकानेक कारण हैं जिनका खामियाजा आज देश की साख के साथ चुकाना पड़ रहा है।

एक अनुमान के मुताबिक हमारे देश में कुल दो फीसदी स्कूलों में ही प्ले ग्राउंड हैं। जो प्ले ग्राउंड हैं भी उनके बारे में यह खुशफहमी निकाल दीजिए कि पश्चिमी देशों की तरह इन खेल के मैदानों में खेल की सारी सुविधाएं मौजूद होगी। यहां तो स्कूल के आगे,पीछे या अगल, बगल छोटा सा खुला मैदान का टुकड़ा होता है जहां बच्चे केवल खुला खेल फर्रुखाबादी यानी केवल दौड़ लगा सकते हैं। उनको क्या पता कि फलां खेल में क्या क्या सुविधाएं होनी चाहिए। बहरहाल कुछ बच्चे तो शौकिया तौर पर खेलकूद में रुचि लेते हैं। स्कूल के बाद गांव या मुहल्ले के बच्चों के साथ खेल के शौक को पूरा करते हैं। लेकिन शौक चुपके-चुपके और भयावह डर के बीच पूरा होता है। अगर घर वालों को पता चल गया कि फलाने खेलने गए थे तो समझो खैर नहीं। इस परंपरागत मानसिकता के तहत हमारे यहां खेलने में समय को जाया करना समझा जाता है। नीति वचनानि के तहत खेलकर लौटते ही आपको मार के साथ पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे होगे खराब जैसा जुमला मुफ्त में सुनाया जाएगा। यह खेल को (खेल-कूद) फन या एंज्वाय करना माना जाता है। जब परंपरागत रूप से कभी हमने खेल को सीरियसली लिया ही नहीं तो हमारे ये अधिकारी भला इस मानसिकता का परित्याग कैसे करते। आखिर इनके पूर्वज भी तो इसी मानसिकता के ओत-प्रोत रहे हैं और क्या-पता कभी इनको भी बख्शीश में लात-घूंसे समय बर्बादी के चलते खाने पड़े हों।

इतिहास गवाह है दूसरे देश के नेताओं से अलग हमारे नेताओं ने कभी खेल में बहुत रुचि नहीं दिखाई। इसका ताजा सबूत है कि राष्ट्रमंडल खेलों की शुरुआत दो अक्टूबर के बाद हो रही है। जिस महापुरुष के जन्मतिथि के बाद इन खेलों की शुरुआत हो रही है, खेलों के प्रति उसकी विरक्ति जगजाहिर है। महापुरुष हैं इसीलिए तो यह सत्य भी इन्होंने अपनी आत्मकथा में स्वीकार कर लिया है। १९३२ में दुनिया में परचम लहराती भारतीय हाकी का लास एंजेल्सि खेलों में भागीदारी करने के लिए वित्तीय मदद के सवाल पर इन राष्ट्रपुरुष ने जवाब में सवाल दागकर कहा कि हाकी क्या है?

एक ये महापुरुष थे और एक वो महापुरुष था माओ। १९१७ में माओ ने जो पहला पत्र लिखा था उसका मजमून खेल की महत्ता पर आधारित था। चीन की तरह खेल हमारे देश में कभी केंद्रीय नीति का हिस्सा नहीं रहे। हालांकि देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने खेल के लिए थोड़ा बहुत किया भी। कम से कम पार्टी की नीतियों के खिलाफ जाकर राष्ट्रमंडल में देश को शामिल तो कराया। आज भले ही सभी खेल संघ नेताओं के चंगुल में लंबे समय से चले आ रहे हों लेकिन बीजिंग ओलंपिक में महज एक स्वर्ण की उपलब्धि एक अरब से ज्यादा की आबादी के लिए किसी तमाचे से कम नहीं है।

खेल जगत में अगर हमें देश को कोई मुकाम दिलाना है तो स्वामी विवेकानंद के पदचिह्नों पर चलना होगा। स्वामी विवेकानंद ने एक बार देशवासियों को भगवान प्राप्ति का एक सहज मार्ग सुझाया था। उन्होंने कहा था कि कोई भी व्यक्ति बहुत आसानी से भगवान को प्राप्त कर सकता है यदि वह घंटो किसी धार्मिक ग्रंथ को पढ़ने की बजाय फुटबाल खेले। आज जरूरत खेल संस्कृति विकसित करने की है न कि खिलाड़ी तैयार करने की या बड़े खेल आयोजन करवाकर मलाई काटने की।

एक मच्छर की मनोदशा


राजधानी दिल्ली सहित पूरे देश में मच्छरराज व्याप्त
है। कुछ तो इनके प्रकोप और कुछ इनके आतंक की
परीकथाओं से बच्चे-बच्चे की जुबान पर इन मच्छरों
का नाम चढ़ चुका है। डेंगू, चिकनगुनिया सहित कई
अज्ञात बीमारियों को बढ़ावा देने वाले मच्छरों को बैठे-
बिठाए आजकल सेलेब्रिटी का तमगा मिल चुका है। इस
पदवी के लिए न तो इन्हें किसी रियलिटी शो का हिस्सा
बनना पड़ा और न ही लाइमलाइट में आने के लिए
कोई ऊंटपटांग हरकत ही करनी पड़ी। नतीजतन आज कई
नामी गिरामी शख्सियतें इनके रसूख से रश्क करने लगी
हैं। नाना प्रकार की मीडिया के चलते चहुंओर इनका गुणगान
सहज ही देखा जा सकता है। इनकी पब्लिसिटी का
आलम यह है कि आजकल सबलोग अपने आसपास
इनकी मौजूगदी को सुनिश्चित कर लेना चाहते हैं।
अपने खड़े, बैठे या लेटे समय चाहे कोई वस्तु दिखे या
न दिखे लेकिन मच्छरों के मौजूदगी की आश्वस्ति के
उपरांत उपक्रम को अंजाम देना लोगों की दिनचर्या का
अनिवार्य हिस्सा बन चुका है।
हे श्रेष्ठ मानव, लिहाजा मैने भी आसन ग्रहण करने के
साथ ही अपने आसपास चौकन्नी निगाह डाली। मेरी
तीक्ष्ण नजरों की जद में एक मच्छर आ ही गया।
लहराते श्रृंगों और ललचाई नजरों से मेरी तरफ देख रहा
था। हालांकि तबतक मैं अति सक्रियता की स्थिति में
आ चुका था लिहाजा मेरे ऊपर आक्रमण का उसे मौका
नहीं मिल सका। उसने घेरा और कसा किया लेकिन
मेरी वक्र दृष्टि से उसे यह आभास हो चुका था कि यहां
उसकी दाल नहीं गलने वाली। फलस्वरूप हमले की रणनीति
के परिणामों की मन ही मन गणना करते हुए अपना
अंतिम असफल प्रयास को अंजाम दिया। उसके डैनों
से ज्यादा तेज गति से कुर्सी पर बैठे बैठे मेरे घूर्णन से
वह मच्छर थोड़ा अचंभित हुआ और बिना सांस लिए
एक साथ मेरी तीन चार परिक्रमा करने के बाद शून्य
में ओझल हो गया। मैं जड़वत कुर्सी पर विराजमान रहा।
अब तक मैं सोचने की मुद्रा में आ चुका था।
शून्य में ताकते हुए हुए मैने सोचना शुरू किया। अगर
यह आर्थोपोडा संघ का जीव आज मुझे डस लेता तो
कई बातें होतीं। मैं किसी रोग से संक्रमित हो सकता था
लेकिन मच्छर को क्या होता। मान लीजिए रक्तपान की
दुस्साहसिक कोशिश के दौरान वह बेचारा शहीद भी हो
सकता था। अच्छा चलो अगर खून चूसने के काम में
कोई मच्छर सफल भी होता होगा तो क्या सोचता होगा?
खून का स्वाद कैसा है? उसके स्वादानुसार रहा तो ठीक
अगर किसी धन्य पुरुष के कसैले खून का पान किया तो
बुरा सा मुंह बनाते हुए अमुक व्यक्ति को ब्लैक लिस्टेड
कर देता होगा। हो सकता है मुंह का जायका खराब हो जाने पर
अपनी संस्कृति की सीमा रेखा को लांघ भी सकता है।
बेचारा मच्छर…….। उई………… मेरी तो चीख निकल गई।
दरअसल एक सेलेब्रिटी मच्छर ने अभी अभी बेदर्दी से
मेरा रक्तपान करके मेरी तंद्रा भंग कर दी है।

Tuesday, July 29, 2008

उदासी

अक्सर जब होता हूं उदास
बैठता हूं लिखने को कविता
पेंसिल से कागज पर
केवल खींचता हूं लकीरें
लोग यह न कहें कि
यार तुम तो बन गए हो
लकीर के फकीर
इससे बचने के लिए
पहले खीचीं गयी रेखाओं
को आड़ी रेखाएं खींचकर काटता हूं
लेकिन यह क्या
बरबस बन जाता है एक अक्स
धुंधला सा नजर आता है एक चेहरा
अतीत में हो जाता हूं गुम
और हो जाता हूं
और उदास,और उदास बहुत उदास

Sunday, April 6, 2008

आर्थिक बूम यही है का

सबसे पहले तो पिछले कुछ दिनों से गायब रहने के लिए माफी चाहूंगा । दरअसल जिंदगी की भाग दौड़ में
मन कब किस चीज से विरक्त हो जाए और कब किस पर आसक्त हो जाए,समझना टेढ़ी खीर है । खैर जब अब आ ही गए है तो सबको नमस्कार ठोंकना चाहूंगा ।
आज अखबार बांचते समय ध्यान गया एक खबर पर । दिल्ली ने जनसंख्या के हिसाब से मुंबई का रिकार्ड तोड़ दिया है । एक संस्था द्वारा किए गए अध्ययन में दिल्ली की आबादी २.२ करोड़ से ज्यादा है वहीं मुंबई की आबादी १.९४ करोड़ है ।
इसमें कोई संदेह की गुंजाइश नहीं है कि मुंबई अब भी सबसे ज्यादा भीड़ भाड़ वाला शहर है । यहां जनसंख्या घनत्व अब भी दिल्ली से कई गुना ज्यादा है।
खैर बात दिल्ली की हो रही थी। यहां की मुख्यमंत्री शीला दीछित पिछले नौ सालों से कुरसी पर विराजमान है । अपने बयानों से विवाद खड़े करना इनको शायद अच्छा लगता है। पिछले दिनों ब्लूलाइन से सडक दुर्घटनाओं पर बयान दिया कि इसके पीछे पैदल यात्री जिम्मेदार हैं । ये लोग संभलकर नहीं चलते । खूब हो हल्ला हुआ । बयान को तोड़ मरोड़ कर पेश करने की दलीलें दी गयी। मामला आया गया हो गया ।
अभी कल के अखबार में महंगाई पर इनका एक और बयान छपा है । बयान में इन्होंने कहा कि महंगाई इसिलए है क्योंकि इकोनामी बूम कर रही है । लोगों के पास पैसा आ रहा है लोग चीजें ज्यादा खरीद रहें है । इसलिए वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे है।
अच्छा चलिए, मान लेते हैं कि लोगों के पास पैसा खूब आ रहा है तो कितना आलू टमाटर भिंडी गोभी खरीद कर डंप करोगे या दाल चावल तेल अनाज खाने की चीजें आदमी जरुरत भर का ही खरीदेगा । या साल भर का इकट्ठा भंडारण कर लेगा ।
माननीय मुख्यमंत्री जी को यह बात समझना चाहिए ।
दूसरी बात यह कि अगर मुद्रास्फीति बढ़ने और अर्थव्यवस्था के बूम में कोई सीधा संबंध होता तो जिंबाबे की अर्थव्यवस्था की विकास दर सब देशों से तेज होती । वहां मुद्रास्फीति १ लाख फीसदी से ज्यादा है । एक जून का भोजन करीब १.५ लाख डालर का पड़ रहा है । अब श्रीमती दीछित जी क्या बताएंगी कि जिंबाबे की विकास दर कितनी तेज है ।
सोचिए सात फीसदी मुद्रास्फीति में हमारे यहां आलम ये है तो वहां क्या होगा । सब्जी खरीदने जाओ तो दुकानदार पाव में भाव बताता है । सब्जी वाला हमारी हैसियत से वाकिफ होता है । उसको पता है कि फलां मद में भाई साहब एक निश्चित रकम ही खरचेंगे । जमीनी हकीकत यह है और बयानबाजी ये हो रही है कि लोग खूब खरीद रहे है जिससे महंगाई बढ़ रही है ।
एक किस्सा बताना चाहूंगा हमारे यहां गांव में कहावत है कि प्रायमरी के अध्यापक टमाटर कटवाकर खरीदते है । इसके पीछे की जो कहानी है वह इस प्रकार है ।
एक मास्टर साहब बाजार गए सब्जी खरीदने । ताजे बड़े-बड़े टमाटर देख कर अपने आपको रोक न सके।
कौतुक बस पूछ ही लिया दुकानदार से क्या रेट है भाई टमाटर,मास्टरजी मुहल्ले के सम्मानित व्यक्ति थे सो विनम्रता के साथ दुकानदार बोला माटसाब २० रु किलो । मास्टर साहब ने कहा बड़े महंगे लगा रखे हो यार । जबाब मिला क्या करें माटसाब मंडी से ही यही हाल है । ऊपर से किराया मार डाल रहा है ।
खैर चूंकि माटसाब दाम पूंछ ही चुके थे तो इज्जत बचाने के लिए लेना ही पड़ता । इसलिए बोले कि अच्छा ठीक है १०० ग्राम दे दो । अब दुकानदार के सारे टमाटर बड़े बड़े । कोई सौ ग्राम का नहीं सब ऊपर । हारकर उसने कहा माटसाब काट कर टमाटर नहीं बेंचता हूं ।
आश्चर्य न करें तब प्रायमरी के अध्यापक की तनख्वाह आज की तरह नहीं थी । तब ५०० रुपये में मन लगाकर पढ़ाते थे और अपने परिवार का भरण पोषण करते थे । अब हालत ये है कि ज्यादा तनख्वाह में भी पढ़ाने में मन नहीं लगता ।

Monday, March 3, 2008

अथ श्री सत्यनारायण प्रथमोध्याय समाप्तः

जीवन में क्या क्या करना पड़ जाए,कुछ कहा नहीं जा सकता है । ऐसा ही कुछ एक बार मुझे करना पड़ा । मैं बीएससी द्वितीय वर्ष का छात्र था । शनिवार की शाम को हम लोग घर चले जाया करते थे । संयोग से एक बार अगले दिन रविवार को पुन्ववासी (पूर्णमासी)पड़ रही थी । लग्न नछत्र एवं मुहुर्त का कुछ ऐसा घालमेल था कि उस दिन सत्यनारायण भगवान की कथा एवं पूजा कराने वालों की इफरात थी । पंडित ढूंढे नहीं मिल रहे थे । हमारे गांव में एक पंडित जी निर्वसिया (अकेले,शादी नहीं की थी) थे । खुद को तो कुछ आता जाता नहीं था लेकिन जजमानी (पुरोहिताई) पूरे इलाके में फैला रखी थी । ठेके पर पंडितों से काम करवाते थे । आज की भाषा में बोलें तो पुरोहिताई की आउटसोर्सिंग करते थे । हमारे इलाके में नए पंडितों की खेप तैयार करने का पूरा श्रेय उन्हीं को जाता है । एक चीज जो और खाश थी उनके बारे में वो था उनका नाम । पूरे इलाके में चिरकुट पंडित के नाम से सन्नाम थे ।तो भइया उस पुन्ववासी के दिन इनके पास भी पंडितों का अकाल पड़ गया । परेशान से हमारे मोहारे (दरवाजे)के पास से गुजर रहे थे । मैने प्रणाम किया तो आशीष के साथ पूछे कब आया हो ?बाबा कलहियां शमवा कय । अच्छा भय राजू पंडित नाय मिलत अहैं । कथा कहय का रहा। ससुर बड़ी लड़जरन बा । हमारे बाबाजी को संबोधित करते हुए,अरे भैयवा येही लड़कवा का भेज देत्या करौनी एक ठी कथा कहय का रहा । बाबा ने कहा अरे ऊ जाबय न करे । ऊ आज कय लवन्डा आय,कथा वथा थोड़य कहे । वही से पूछ ल्या जाय तौ लय जा । बाबाजी ने उनको मेरी इच्छा जानने के लिए कहा । बुजुर्गो के प्रति असीम श्रद्धा भाव हमारी कमजोरी बन गया । इनकार न कर सके लेकिन फिर भी आशंका व्यक्त की, अरे पंडित जी हम कब्भऊ (कभी नहीं) कथा नाय कहे हई । पंडित जी ने कहा बेटा इतना ऊंचे दरजा में पढ़त हया अऊर किताबें मा लिखा न पढ़ पउब्या । हमने उत्तर दिया ऐसी बात नहीं है पंडित जी किताब में जो लिखा होगा उसको तो पढ़ ही लूंगा लेकिन जो अन्य चीजें करनी होती है जैसे फूल रखने,अछत रखने और टीका लगाने,आरती के समय,गोदान,या हवन के समय जो श्लोक पढ़े जाते हैं वो सब मैं थोड़े ही जानता हूं । और वो सब किताब में भी नहीं लिखे रहते । पंडित जी ने भरोसा दिलाते हुए कहा बेटवा वोकर चिंता तू न करा । हम का करय चलत हई । ऊ सब हम करवाय देब । खैर हम नही धोकर धोती तो नहीं पहनी पैंट शर्ट पहनकर चल दिए । दरवाजे पर पहुंचे तो पंडित जी ने कहा कि सब तैयार हय क्या । जजमान ने हाथ जोड़कर कहा हां पंडित जी बस आप चलय बेदी पर । सब इंतजार कर रहें हय । पंडित जी मुझको लेकर बेदी पर पहुंचे और कहा आपको कथा नए पंडित जी सुनाएंगे । सबकी नजरें हमारी तरफ । चेहरे पर आश्चयॆ और उपेछा का भाव । मैं सहसा डर गया । पंडित जी भी भांप गए ,सबको बोले ऐसे मत देखो बहुत ऊंचे दरजे में पढ़ रहा है । खैर कथा शुरू हुई । तमाम कर्मकांड पहले करने पड़ते हैं मैने इशारे से पंडित जी को कहा लेकिन वो जैसे मेरी तरफ ध्यान ही नहीं दे रहे थे । बहुत दुख हुआ सोचा कि आज तो बड़ी बेइज्जती हो जाएगी मार ऊपर से पड़ेगी । फिर मैंने कछा ६ से लेकर ८ तक संस्कृत परिचायिका के जितने श्लोक कंठस्थ किए थे बारी बारी से सबको अजमाया और सबका प्रयोग किया । गनीमत यही रही कि जहां कथा हो रही थी वह परिवार कम पढ़ा लिखा था और श्रद्धालु जो आए थे सुनने वो भी शायद संस्कृत में टाइट थे वरना पंडित जी के साथ हमारी भी कुटाई हो जाती । एक बार तो नाईन ने टोक भी दिया था । हुआ ये कि जब मैं श्लोक पढ़ता तो कोई लंबा श्लोक बिना पूरा किए नहीं रूकता था । बगल में बैठे पंडित जी मुझे हुरिया (कोहनी मार) देते थे । आशय यह होता था कि अब बस करो । नाईन जिसे आधा पंडित माना जाता है उसने पंडित को टोका,पंडित जी आप छोटकऊ पंडी जी को पूरी मंतर पढ़ने से मना क्यों करते हों ।खैर सब अच्छा हुआ । लेकिन यह अनुभव हमेशा एक नया रोमांच देता है ।हां कथा के दौरान मंत्र के रुप में मैने एक श्लोक यह भी पढ़ा था जो शायद संस्कृत परिचायिका कछा ६ की किताब से उद्धृत था ।
चलंतु वीर सैनिकः,पर्यान्तु वीर सैनिकःसगौरवं साडिम डिम व्रजन्तु वीर सैनिकः
ये पंक्तिया नेताजी सुभाष चंद्र वोस अपनी सेना के सैनिको को आगे बढ़ने के लिए उत्साहित करने में करते हैं।
कैसी रही, जरूर लिखें ।

Sunday, March 2, 2008

डिप्टी साहब का आतंक

देश का बजट चिदंबरम साहब ने पेश कर दिया है । खुशी मनाने वालों की तादाद ज्यादा है जबकि गमगीन तबका बहुत छोटा है । जो भी हो हम बजट की मीनाकुमारी नहीं करने जा रहे हैं । हर साल बजट आता है और आम जनता इसे एक नियति मान कर स्वीकार करती है । या आप लोग बताओ कि किसी बजट आने के बाद फलां चीज खरीदनी बंद कर दी या किसी आदत पर महंगी होने के कारण कंट्रोल कर लिया हो । नही न । तो फिर काहे की किलकिल । हो गया यार जो हो गया । टेँशन लेने का नहीं देने का । सभी के गाड़ी,फ्रिज.टेलीविजन,रोजमर्रा की चीजों पर विराम थोड़े लगेगा । महंगी हो या सस्ती । फर्क पड़ता है लेकिन होनी को कौन टाल सकता है ।
खैर इस बहस में पड़ने की बजाय कुछ काम की बातें कर ली जाए । यह सब नेताओं के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए । इस बजट में क्या लगभग सभी बजट में सरकार का शिछा छेत्र में खर्च की परिपाटी जीडीपी का लगभग ३ फीसदी से थोड़ा सा ज्यादा है । इससे ज्यादा तो चीन,कोरिया एवं ताईवान जैसे देश कर रहे हैं । इन देशों का एजुकेशन सेक्टर पर खर्च जीडीपी का पांच फीसदी से अधिक है किसी का सात फीसदी से भी ज्यादा है । भारत सरकार इससे थोड़ा ही कम गोला बारूद खरीदने यानि रछा छेत्र में करती है । तो आप ही बताइये हमारे भावी कर्णधार पढ़ लिखकर गण तंत्र चलाएगे या गनतंत्र संभालेंगे । इसके बानगी एक वाकया पेश करना चाहूंगा । इजाजत है । शुक्रिया आप लोगों की इजाजत का ।
हां तो भइया अगर आप भी गांव गुरबे के किसी परायमरी (प्राइमरी) स्कूल के प्रोडक्ट होकर और आज कान्वेंट के लड़कों से मोहड़ा (मोर्चा)ले रहे है तो आप समझ गए होंगे पऱायमरी स्कूलों में डिप्टी साहब का आतंक । होता क्या है कि महीने चार महीने में इन स्कूलों में मानीटरिंग के लिए डिप्टी साहब दौरे पर आते हैं । लचर पढ़ाई और कुव्यवस्था होने के कारण इन स्कूलों के अध्यापकों में डर साफ झलकता है । सभी बच्चों को एक दिन पहले ही चेताया जाता है कि कल डिप्टी साहब आने वाले हैं साफ सुथरे कपड़े पहन कर आना । गदहा पार्टी छुट्टी भी कर सकती है । इतने भयभीत रहते थे अध्यापक की बच्चे भी उनके इस डर को भांप जाते थे । परिणामस्वरूप बच्चों में अध्यापकों से कई गुना डिप्टी साहब का खौफ घर कर जाता था । इसे आप अध्यापकों की अग्यानता ही कहेंगे कि डिप्टी साहब के बारे में सही जानकारी बच्चों को नहीं दी जाती थी ।
लेकिन डिप्टी साहब के औचक निरीछण के दौरान अध्यापकों की फूंक सरक जाती थी । अप्रत्याशित दौरे से तैयारी का समय नहीं मिल पाता था । जो जैसा है उसी हाल में डिप्टी साहब सबसे मिलते थे । एक एक क्लास में विजिट करते हुए एक बार इसी तरह के औचक निरीछण के दौरान डिप्टी साहब कछा पांच में पहुंचे । परायमरी में कछा पांच सबसे बड़ी क्लास होती थी और उसे डायरेक्ट हेडमास्टर डील करते थे । हेडमास्टर साहब पढ़ा रहे थे । डिप्टी साहब के पहुंचने पर सब शांत हो गए । डिप्टी साहब ने पूंछा मास्टर साहब क्या पढ़ा रहे हो बच्चों को । उत्तर मिला हिंदी । बच्चों के आई क्यू टेस्ट के लिए डिप्टी साहब ने पूंछा बच्चों पर्यायवाची क्या होता है? कोई उत्तर नहीं आया? डिप्टी साहब ने क्लिष्ठ प्रश्न को थोड़ा और आसान करते हुए पूछा बच्चों बताओ कोई एक ही चीज हो और उसके नाम अलग अलग हों । कछा में मौत सा सन्नाटा । कोने से एक हाथ ऊपर उठा । ये हाथ था भुनगू शर्मा का । भुनगू के बारे में बताते चलें कि कछा में सबसे गदहा लड़का था । कुछ भेजे में घुसता ही नही था,अव्वल तो भेजा था ही नहीं । हेडमास्टर साहब के दिल की धड़कने १८० की रफ्तार में । सोच रहे थे सब गुड़ गोबर हो गया । क्लास का सबसे तेज लड़का क्यों नही हाथ खड़े कर रहा है । मन को सांत्वना भी दे रहे हैं शायद डर रहा है। खैर डिप्टी साहब के पीछे से हाथ से इशारा करके भुनगू को मना करने का हेडमास्टर का असफल प्रयास ताड़ गए डिप्टी साहब । हेडमास्टर को डांटते हुए बोले, बोलने दो बोलने दो, जब बच्चा बताने जा रहा है तो आप मना क्यों कर रहें हैं । भुनगू खड़े हुए बोले, गुरूजी बताई । डिप्टी साहब ने पुचकारते हुए कहा हां,बेटा बताओ । गुरूजी बार (बाल या हेयर)। डिप्टी साहब ने पूंछा ,कैसे ।
भुनगू लगे व्याख्या करने । हाथ उठाकर अपने सिर पर रखते हुए भुनगू बोले, गुरूजी मूढे कय बार (सिर का बाल),बरौनी, मूंछ,दाढ़ी अऊर गुरूजी सीना कय बार अऊर गुरूजी.....
हेडमास्टर साहब बड़ी तत्परता दिखाते हुए उसकी बात को बीच में ही काटते हुए चिल्लाए, बस भुनगू बस, अब और नीचे नहीं जाना । डिप्टी साहब भी भुनगू की इस सरलता पर मन ही मन मुस्कराए बिना नहीं रह सके।
तो जनाब यह है हमारी प्राथमिक शिछा तंत्र का हाल । जब मास्टर ही अवेयर नहीं है तो छात्र तो बेचारे छात्र ही हैं।
कैसी रही जरूर लिखे ।

Monday, February 25, 2008

देवलोक में भी खटमलों का प्रकोप

देवलोक में भी खटमलों का प्रकोप गर्मियां शुरू होने को हैं । मच्छरों एवं खटमलों के सक्रिय होने का समय आ रहा है । पूर्व में आए तमाम सर्वेछणों में बताया गया है कि तनाव या फलाने चीज के कारण नींद नहीं आ रही है लोगों को । एक तो करेला उस पर नीम चढा । अब ये आथ्रोपोडा संघ के राछस जीना हराम कर देंगे । टीवी पर एक से एक कीटनाशकों का प्रचार आता है लेकिन ये कीटनाशक इनके लिए टानिक का काम कर रहे हैं । इनकी प्रतिरछा प्रणाली कीटनाशक चाट चाट कर इतनी सुदृढ़ हो गयी है कि अब कीटनाशक इनके लिए इत्र हो गये हैं । इत्र लगाकर ये अपने काम को ज्यादा प्रभावी ढंग से अंजाम दे रहे हैं ।अब क्या किया जाय क्या तोड़ हो सकता है इन राछसों का । कैसे नींद पूरी करें । बगैर नींद पूरी किए हर छेत्र में आपका प्रदर्शन गड़बड़ा जाएगा । इस तरह से देश की पूरी वर्कफोर्स ही ढह जाएगी । आईटी और बीपीओ जिसके दम पर भारत महाशक्ति बनने का दंभ भरता है,इनके कर्मचारियों का तो रात भर जागरण और दिनभर आ-मरण हो जाएगा । खैर मैं बड़ा चिंतित हुआ । गहन सोच में डूब गया । सोचा कि यार ये अपने देवता लोग तो चारपाई पर सोते ही नहीं हैं । इस संदर्भ में कभी पढ़ा हुआ एक श्लोक याद आयाश्लोक कुछ इस प्रकार था
कमले कमला शेते, हरः शेते हिमालयः ।
छीराब्धौ च विष्णु शेते,मन्ये मत्कुढ़ शंकया ।।
देवियों और सज्जनों भावार्थ यह है कि कमल के पुष्प पर लछ्मी जी निवास करती है । देवादिदेव महादेव भगवान शिव जैसे देवता भी हिमालय पर्वत पर स्थान बनाए हुए है । वहीं तीनों लोकों के मालिक विष्णु भगवान छीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर नींद का परमसुख भोगते है । क्या कारण है ये लोग चारपाई का उपयोग नहीं करते है कहीं इसके पीछे खटमलों का भय तो नहीं है?
किसी ने ठीक कहा है कि न सोने जैसा सुख,न रोने जैसा दुख । इस भवसागर रूपी पृथ्वी पर भी सबसे बड़ा सुख अच्छी नींद लेना है । जैसा कि आपने देखा कि देवलोक में भी इस सबसे बड़े सुख को अर्जित करने के लिए हमारे धुरंधर देवता भी चारपाई का प्रयोग नहीं कर रहे हैं ।इसलिए हे प्राणी हमें भी इस सुख को हासिल करने के लिए कुछ विकल्पों पर सोचना होगा ।